सुख और दु:ख वैचारिक तौर पर अधिक उत्पन्न होते हैं। Sukh aur dukh vaicharik taur per adhik utpann hote Hain
आप सुखी और दु:खी कैसे होते हैं ? आप एक मकान में रहते हैं, जिसके दोनों और भी मकान हैं। एक मकान आपके मकान से ऊंचा और भव्य है तथा दूसरा मकान आपके मकान से छोटा और झोपड़ीनुमा है। आप घर से बाहर निकलते हैं और जब भी आलीशान कोठी को देखते हैं, आप दु:खी हो जाते हैं और जब झोपड़ी को देखते हैं तो सुखी हो जाते हैं। भव्य इमारत को देख कर मन में विचार आता है , ईर्ष्या जगती है - यह मुझसे ज्यादा सुखी है जब तक मैं भी ऐसा तीन मंजिला मकान न बना लूं तब तक सुखी ना हो सकूंगा। लेकिन जैसे ही झोपड़ी को देखते हैं तो सुखी हो जाते हैं, क्योंकि आपको लगता है कि यह तो आपसे अधिक दु:खी है। प्रकृति की व्यवस्था तो सबके लिए समान है, लेकिन प्रायः स्वयं के अंतर कलह के कारण ही व्यक्ति दु:खी हो जाता है।
जैसे कि आपने लॉटरी का टिकट खरीदा। लॉटरी खुली और आपने अखबार में देखा कि उसमें वही नंबर छपे हैं जो आप के टिकट पर है। आपकी तो किस्मत ही खुल गई, आप ने प्रसन्न होकर घर में बताया कि पांच लाख की लॉटरी खुली है। सब बहुत खुश है। प्रसन्नता के मारे आपने अच्छी सी पार्टी का आयोजन भी कर डाला। मित्र आए, ऊपरी मन से आपको बधाइयां भी मिली, अंदर से तो उन्हें डाह हो रही थी लॉटरी तो उन्होंने भी खरीदी थी, पर इसके कैसे खुल गई है। खैर, रात में जब सोने लगे तो विचार आया कि इस इनामी राशि को कैसे खर्च किया जाए ? सोचा कि एक कार ही ले ली जाए। तभी दूसरे विचार ने जोर मारा कि दो लाख जमा करा दिए जाएं, ताकि भविष्य सुरक्षित रहेगा। इसी उधेड़बुन में रात निकली। दूसरे दिन सुबह प्रतिदिन की भांति अखबार उठाया। जिस कोने में कल नंबर छपे थे, आज वही एक अन्य विज्ञापन भी था। नजरें वहां गई और आप दु:खी हो गए, क्योंकि उसमें एक कॉलम था, 'भूल सुधार' वहां लिखा था कि प्रथम इनाम के लिए कल जो लॉटरी खुली थी उसमें अंतिम नंबर तीन के बजाय दो पढ़ा जाए। न रुपये आए और न गए, फिर भी सुख और दु:ख दोनों दे गए।
सुविधाओं के आधार पर जो लोग सुखी होते हैं, वे सुविधाएं छिन जाने पर दु:खी हो जाते। जो जीवन के आरपार सुख होते हैं, वे सुविधाओं के चले जाने पर भी सुखी ही रहते हैं।
मैं कभी ईश्वर से सुख की कामना नहीं करता। यह अटूट विश्वास है कि दुनिया में कोई भी व्यक्ति कभी ईश्वर से दु:ख की कामना नहीं करता पर हर एक को दु:ख से गुजर ना होता है, वैसे ही सुख की कामना की जरूरत नहीं। जब दु:ख अपने आप बिन मांगे आता है तो सुख को वैसे भी बिना मांगे स्वत: आने दीजिए।
जीवन में चाहे सुख हो या दु:ख दोनों का स्वागत तहे दिल से कीजिए, सुख का स्वागत तो हर कोई करता है और सुखी आदमी तभी हो पाता है जब जीवन में आने वाले दु:खों का स्वागत करने के लिए भी वह तैयार हो।
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