गेहूं, ज्वार, बाजरे का संग्रह करने का साधन कोठी है।
आभूषण के संग्रह का साधन तिजोरी है। पैसे का संग्रह करने का साधन जेब है। स्याही का संग्रह करने का साधन दवात है। इसी तरह ज्ञान का संग्रह करने का साधन पठन है।
संग्रह का तात्पर्य क्या है ?
संग्रह का प्रायोजन क्या है ?
उत्तर है - सुरक्षा !
कोठी में संग्रहित होने वाला अनाज सुरक्षित हो जाता है। तिजोरी में संग्रहित होने वाला आभूषण सुरक्षित बन जाता है। जेब में संग्रहित होने वाला पैसा सुरक्षित हो जाता है। दवात में संग्रहित होने वाली स्याही सुरक्षित हो जाती है। ठीक इसी तरह पठन में संग्रहित होने वाला ज्ञान सुरक्षित हो जाता है।
एक बात सतत दृष्टि के समक्ष रखने की आवश्यकता है और वह यह है कि,
आज हमारे पास जो भी ज्ञान है वह या तो दीपक जैसा है या फिर बगीचे में खिलने वाले पौधे जैसा है।
दीपक को सतत प्रज्वलित रखने के लिए जैसे उसमें तेल या घी डालना पड़ता है, विकसित हो रहे पौधे को धरती पर टिकाए रखने के लिए जैसे उसे पानी से निरंतर सींचते रहना पड़ता है वैसे ही हमारे पास रहे हुए ज्ञान को हृदय में स्थिर करने के लिए हमें सतत पठन करते ही रहना पड़ता है।
परंतु दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि आज की एडवांस टेक्नोलॉजी ने मानव की दर्शनशक्ति एवं श्रवणशक्ति की भूख को तो कल्पनातीत हद तक जागृत कर दिया है लेकिन पठनशक्ति को तो मानो उसने लकवाग्रस्त ही बना दिया है !
और,
मानव ने पठनशक्ति को कुछ हद तक शायद जीवित रखा भी है तो उसमें स्तरहीन व्यर्थ एवं नुकसानदायक पठन का समावेश अधिक है।
सुख में स्वस्थ रखे, दु:ख में मस्त रखें, प्रलोभन के सामने अटल रखें, पीड़ा के सामने अटूट रखें ऐसा पठन आज के मानव के पास कितना है यह लाख रूपय का प्रश्न है।
क्या कहूं ?
सौ रुपये का नोट पांच सौ व्यक्तियों के हाथ में घूमने के बाद भी जैसे अपना मूल्य टीकाकर रखता है वैसे ही हमारे पास रहा हुआ ज्ञान एवं पठन ऐसा होना चाहिए कि वर्षो बीत जाने के बाद भी उनके आधार पर मूल्यों के प्रति हमारी निष्ठा टिकी ही रहे !
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
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