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जो मेरा है वह सत्य नहीं है पर जो सत्य है वही मेरा है Jo Mera hai vah Satya Nahin hai per Jo Satya hai vahi Mera hai


एक सत्य है,
जिसका नाम है " आभासिक सत्य "।
जो वास्तव में सत्य ना होने के बावजूद सत्य लगता है उसका नाम है आभासिक सत्य। रेगिस्तान में पानी नहीं होता इसके बावजूद हिरण को पानी का दर्शन होता है यह आभासिक सत्य।
एक दूसरा सत्य है जिसका नाम है  "व्यवहारिक सत्य"।
व्यवहार चलाने के लिए जो सत्य उपयोगी होता है उसका नाम है - व्यवहारिक सत्य। मेरा नाम या व्यवहारिक सत्य हैं।
पिता - पुत्र का संबंध यह व्यवहारिक सत्य है। घर का पता यह व्यवहारिक सत्य हैं।
एक तीसरा सत्य हैं जिसका नाम है,
" पारमार्थिक सत्य "
आत्मा, आत्मा का स्वरूप, आत्मा के गुण, यह है पारमार्थिक सत्य।
संक्षिप्त में,
जो वर्तमान में नहीं है इसके बावजूद उसकी उपस्थिति महसूस होती है वह है आभासिक सत्य।
और जो भूत - भविष्य - वर्तमान तीनों काल में है वह है पारमार्थिक सत्य।
अब जवाब दो कि पारमार्थिक सत्य के लिए कहीं लड़ाई संभावित है भला ?
नहीं।
लड़ाई के केंद्र में या तो आभासिक सत्य हो सकता है या फिर व्यवहारिक सत्य हो सकता है और वह भी तब जबकि उस सत्य को पारमार्थिक सत्य मान लिया जाए।
एक बात बताऊं ?
कौन सच्चा है इसके बदले क्या सच्चा है, यदि तय कर लिया जाए तो सत्य के नाम पर आज जो लड़ाई - झगड़े हो रहे हैं उन तमाम लड़ाई - झगड़ों पर पूर्णविराम लग सकता है। किसी पुस्तक में पड़ी हुई इन पंक्तियों पर हमें गंभीरता से सोचने की आवश्यकता है - "हमारे हिसाब से जो ' सच्चा ' होता है उससे हम इतने लबालब भरे हुए होते हैं कि दूसरों के सत्य को समझने की हमारे मन में थोड़ी सी जगह शेष नहीं रहती।
दूसरे हमें समझे इसके लिए हम सतत उठा पटक करते रहते हैं, हमारी सभी बातें एकपक्षीय हो जाती हैं, पर दूसरों के अंदर क्या चल रहा है उसका हमें पता ही नहीं चलता।"
एक काम करें।
" जहां मैं वहां सत्य " ऐसा नहीं पर
" जहां सत्य वहां मैं "
इस रवैये के मालिक बन जाए।


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