मकान का निर्माण करना है ?
होशियार इंजीनियर को बुलाना पड़ेगा। मकान को तोड़ना है ?
अकुशल मजदूर भी चलेगा।
200 पन्नों की पुस्तक लिखनी है ? बुद्धिमान लेखक की जरूरत पड़ेगी।
उस पुस्तक को फाड़ना है ?
मस्तीखोर लड़के से भी काम बन जाएगा। दीपक को प्रज्वलित करना है ?
दिया, तेल, बाती, माचिस और बिना पवन वाली जगह की आवश्यकता पड़ेगी।
दीपक को बुझाना है ?
एक फूंक काफी है।
यह समस्त वास्तविकता इतना ही इंगित करती हैं कि,
सर्जन कठिन है, विध्वंस सरल है।
निर्माण कठिन है, विनाश सरल है।
प्रश्न यह है कि हमारी जीवनशैली कैसी है ? कैंची जैसी है या सुई जैसी ?
एसिड जैसी है या मरहम जैसी ?
नींबू जैसी है या जामन जैसी ?
याद रखना,
वस्तुओं को तोड़ने वाले और जोड़ने वाले तत्व अनेक प्रकार के हैं, परंतु संबंधों को तोड़ने वाला तत्व एक ही है जिसका नाम है अहंकार। और जोड़ने वाला तत्व भी एक ही है जिसका नाम है प्रेम।
अपने भूतकाल की तरफ दृष्टि करके देखना। इस बात की तुम्हें स्पष्ट प्रतीत हो जाएगी कि संबंध में जहां भी अहंकार बीच में आया होगा उसने संबंध रूपी वस्त्र के लिए कैंची का ही काम किया होगा और जहां भी प्रेम हाजिर हो गया होगा उसने संबंध रूपी वस्त्र के लिए सुई का ही काम किया होगा।
किसी अज्ञात कवि ने इन पंक्तियों के माध्यम से अच्छा संदेश दिया है -
" अहम के लिए एक को हमेशा प्रथम रहना था ! समस्या की जड़ का यही तो भाई मूल था । हवा के साथ नाता जोड़ा जैसे ही ऊंची हुई गर्दन गुलाब की। भूल गया कि उसका धूल में तो मूल था !
हां, यदि हम अपने आप को ' सुई ' बनाना चाहते हैं तो छोड़ते रहकर प्रिय बन सकते हैं परंतु खुद की मनमर्जी का करवाकर प्रिय नहीं बना जा सकता।
इस गणित को नजरों से समक्ष रखकर हम संबंध के क्षेत्र में छोड़ते रहना सीख लें।
फिर ?
अक्षर, शब्द, भाषा अनुपस्थित होने के बावजूद उपस्थित रह सके ऐसे प्रेम के हम मालिक बने रहेंगें।
संबंध टूटने का प्रश्न ही नहीं रहेगा ।
प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...
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