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आलस, यह जीवित व्यक्ति की मृत्यु है aalas, yah jeevit vyakti ki mrutyu hai


प्रमाद और आलस के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर है। न करने जैसा करते रहना इसका नाम है प्रमाद और करने योग्य न करना इसका नाम है आलस।
संसार की भाषा में कहना हो तो यह कहा जा सकता है कि, जुए में संपत्ति बर्बाद करना यह है प्रमाद और तेजी के समय में व्यापार पर ध्यान न देकर मौज - मजे करते रहना यह है आलस।
और अध्यात्म की भाषा में कहना हो तो यह कहा जा सकता है कि, पापप्रवृत्तियां करते रहना यह है प्रमाद और धर्मप्रवृत्तियों के अवसर को गंवातें रहना यह है आलस। वास्तविकता यह है कि प्रमाद और आलस दोनों खतरनाक है।
प्रमाद तुम्हें दुर्गति की ओर अग्रसर करता है और आलस तुम्हारे लिए खल सकने वाले सद्गति के द्वार पर ताला लगा देता है।
प्रश्न मन में यह पैदा होता है कि वास्तविकता यह होने के बावजूद इंसान जान-बूझकर प्रमाद और आलसी क्यों बनता है ?
एक दृष्टिकोण से यह प्रश्न का उत्तर यह हो सकता है कि पापप्रवृत्ति और धर्मप्रवृत्ति के फल पर हृदय में श्रद्धा का कोई भाव न होना।
सत्कार्य से सद्गति और दुष्कार्य से दुर्गति, धर्म से सुख और पाप से दुःख।
जहां यह श्रद्धा न हो वहां पाप से निवृत्त होने का और धर्म में प्रवृत्त होने का सवाल ही कहां पैदा होगा ?
दूसरी एक संभावना यह है कि श्रद्धा होती तो है, पर वह कमजोर होती है।
कमजोर अर्थात् ?
संदेह मिश्रित श्रद्धा।
पाप करने से दु:ख शायद आते होंगे !
धर्म करने से सुख शायद मिलते होंगे !
ऐसी कमजोर श्रद्धा पाप से निवृत्त और धर्म में प्रवृत्त भला कैसे होने देगी‌ ?
एक बात समझ लेना कि चालाक व्यक्ति संसार के क्षेत्र में प्रमाद या आलस, दोनों में से एक का भी शिकार नहीं बनता क्योंकि उसे अच्छी तरह ख्याल होता है कि यहां पर प्रमादी और आलसी बनकर सुख की कोई आशा रखनी व्यर्थ है।
जो चुनौती है वह अध्यात्म के क्षेत्र की है। इतना ही कहूंगा कि,
" धर्मी जागते भले, पापी सोते भले",
प्रभु महावीर के इस वचन को दृष्टि के समक्ष रखकर हम पापनिवृत्त - धर्मनिवृत्त बन जाएं।


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