कचरे को और गुलाब को पहचानने में दिक्कत नहीं होती पर सज्जनों को पहचानने में होती है kachre ko aur gulab ko pahchan mein dikkat Nahin Hoti per sajjano ko pahchan mein hoti hai
कुपथ्य का सेवन करके भूख मिटाना उसकी बजाय भूखा रहना अधिक हितावह है।
गटर के पानी से प्यास बुझाना उसकी बजाय प्यासे रहना अधिक हितावह है।
बस इसी तर्ज पर,
अकेलेपन की पीड़ा से छुटकारा पाने के लिए दुर्जनों के साथ रहना उसकी वजह अकेले रहना अधिक अच्छा है !
कारण दुर्जन दुर्गंध जैसे होते हैं।
जैसे तुम दुर्गंधी पदार्थ के निकट बैठो तो वह तुम्हारी हालत बिगाड़ देते हैं वैसे ही तुम दुर्जन की सोबत में रहो तो वह तुम्हारी समस्त क्षेत्रों में हालत बिगाड़ देते हैं।
तुम गधे के पीछे चलो, वह ज्यादा से ज्यादा क्या करेगा तुम्हें दुलत्ती मार कर भाग जाएगा।
तुम कुत्ते के पास चलो, वह तुम्हें काट कर भाग जाएगा।
तुम सांप के साथ दोस्ती करो, वह तुम्हें डस
कर भाग जाएगा।
पर,
तुम दुर्जन की सोबत में रहो, वह तुम्हारे संपूर्ण जीवन बर्बाद करके रख देगा।
संक्षिप्त में,
जागते रहकर रावण और बनना उसकी बजाय कुंभकरण बनकर सोते रहना अधिक हितावह है। उसमें शायद लाभ न भी हो पर नुकसान तो बिल्कुल नहीं होगा।
परंतु ……
राम जैसे दोस्त मिलते हो तो कुंभकरण न बनकर विभीषण बन जाना अधिक हितावह है। इससे खराब बनने पर तो पूर्णविराम लग ही जाता है पर साथ ही अच्छे बनने की समस्त संभावनाएं खुल जाती हैं।
यद्यपि,
कचरा हर जगह मिलता है, पर गुलाब को ढूंढना पड़ता है वैसे ही दुर्जन सर्वत्र मिल जाते हैं, पर सज्जनों को ढूंढना पड़ता है।
और इसमें सबसे बड़ी समस्या यह है कि कचरे को और गुलाब को पहचानने में कोई दिक्कत नहीं आती,
परंतु
दुर्जन और सज्जन को पहचानने में तो खासी दिक्कत आती है।
पर इसके बावजूद हमें उन को पहचानना ही है। एक से छूटकर दूसरे के साथ जुड़ ही जाना है। अहित से बच जाने की और हित को प्राप्त कर लेने की एकमात्र उत्तम प्रक्रिया है।
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