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मनुष्य की सर्वश्रेष्ठ संपत्ति अर्थात उसका उत्तम चरित्र manushya ki sarvshreshth sampatti arthat uska Uttam Charitra


पैसे को संपत्ति तो गुंडा भी मानता है।
सौंदर्य को संपत्ति तो वासना लंपट भी मानता है।
सत्ता को संपत्ति तो सत्तालोलुप भी मानता है।
स्वास्थ्य को संपत्ति तो शरीरपूजक भी मांनता है,
पर
उत्तम चरित्र को संपत्ति मानने के लिए तो हृदय की उत्तमता चाहिए।
जवाब दो -
उत्तम चरित्र के लिए हृदय के किसी कोने में तीव्र ललक पैदा होती है भला ?
इसके बिना जीवन दरिद्र है ऐसी मान्यता हृदय में स्थिर हो गई है भला ?
किसी अज्ञात लेखक की यह पंक्तियां चरित्र के महत्व को रेखांकित करती हैं -
" जैसे पत्तों को सजाने से अथवा पानी पिलाने से वृक्ष का विकास नहीं हो सकता वैसे ही चाहे जितने कौशल का विकास कर ले, चरित्र के विकास की कमी पूर्ण नहीं की जा सकती।चरित्र का विकास अर्थात हमारे मूल्यवान जीवन का क्षण - क्षण का विकास है "
हां, चरित्र स्कूल - कॉलेज की परीक्षा जैसा नहीं है कि जिसमें ३५% अंक प्राप्त कर लो तो भी पास हो जाओ।
चरित्र तो है गणित के विषय जैसा,
जिसमें एक भी अंक की भूल पूरे सवाल को गलत कर देती है।
चरित्र तो गाड़ी के स्टेरिंग व्हील पर बैठे हुए ड्राइवर जैसा,
जिसे आने वाली की नींद की एक भी झपकी भयंकर दुर्घटना को आमंत्रित कर बैठती है।
प्रश्न यह पैदा होता है कि यह चरित्र आखिरकार है क्या ?
यह करना या नहीं करना क्या इसमें चरित्र का समावेश हो जाता है ?
इस प्रश्न का उत्तर नहीं मैं है।
जैसे शरीर का कोई अंग वह संपूर्ण शरीर नही है वैसे ही यह करना और यह नहीं करना यह संपूर्ण चरित्र नहीं है।
इस संदर्भ में किसी अज्ञात लेखक की यह पंक्तियां पढ़ लो -
" जीवन सार्थक करें ऐसे चरित्र का विकास अर्थात हर पल अंतरात्मा का अनुसरण करना सीखना। अंतरात्मा की आवाज इतनी नाजुक है कि दूसरे शोरगुल में भी वह आसानी से खो सकती है। परंतु फिर भी यह आवाज इतनी स्पष्ट है कि उसकी उपस्थिति के बारे में कोई शंका या गलती होना संभावित नहीं है।"
संदेश स्पष्ट है।
जो निर्दोष हैं ऐसे अंत:करण की आवाज को सुनो - समझो और उसका अनुसरण करो। चरित्र का निर्माण होकर ही रहेगा।


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