एक राजा था , उसकी एक रानी , एक पुत्री और एक दासी थी । जैनधर्म के रंग (प्रभाव) में रंगा यह पूरा परिवार वैरागी था , यहाँ तक कि दासी भी वैराग्य में जागृत थी ।
एक बार किसी प्रसंग पर राजा वैराग्य पूर्वक कहता है कि - " हे जीव ! तू शीघ्र ही धर्म - साधना कर ले । यह जीवन तो क्षणभंगुर है । दो-चार दिन का ही है । इसका क्या भरोसा ? "
उसी समय रानी बोली - " महाराज ! आप भूल कर रहे हैं ! क्योंकि दो - चार दिन का भी क्या भरोसा ? रात को हँसते हुए सोते हैं और सुबह को जीवन - लीला ही समाप्त हो जाती है , इसलिए कल के भरोसे नहीं रहना चाहिए । "
उसी समय पुत्री गंभीरता से कहती है - " पिताजी और माताजी ! आप दोनों भूल कर रहे हैं । दो - चार दिन या सुबह - शाम का भी क्या भरोसा ? आँख की एक पलक झपकने में ही कौन जाने क्या हो जाये ? "
दासी भी वहीं खड़ी - खड़ी यह धर्म - चर्चा सुन रही थी , अन्त में वह भी कहती है - " अरे , आप सब भूल कर रहे हैं । आँख के झपकने में तो कितना समय (अन्तर्मुहूर्त ) चला जाता है .... इतने समय का भी क्या भरोसा ? हमें दूसरे समय की भी राह देखे बिना वर्तमान समय में ही अपनी आत्मा को समझकर आत्महित में सावधान होना चाहिए । आत्महित का काम दूसरे समय पर नहीं छोड़ना चाहिए । एक समय का भी विलम्ब करना योग्य नहीं है । "
इस छोटी सी कहानी से यह शिक्षा लेना चाहिए कि - आत्मसाधना कब करना ? आज...आज...और...अभी ।
🙏🙏 सहज तरीके से अपनी कहानियों में गूढ़ बातें कहना आप की कला है।
ReplyDeleteधन्यवाद.....
ReplyDelete🙏
ReplyDeleteVERY GOOD MOTIVATIONAL STORY
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