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गोविंद का साक्षात्कार कराना सिर्फ गुरु के हाथ में है। Govind ka sakshatkar karana sirf Guru ke hath mein hai.


एक बार नारद जी भगवान लक्ष्मी नारायण के दर्शन हेतु पहुंचे। भगवान ने नारद जी से कुशलता पूछी और उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। नारद जी ने बताया कि वह पृथ्वी लोक पर भ्रमण करके आ रहे है।


लक्ष्मी माता ने कहा नारद जी ,आपने पृथ्वी लोक पर गुरु से दीक्षा ली या नहीं। नारद जी ने कहा नहीं माता इस पर लक्ष्मीजी माता ने कहा कि पृथ्वी लोक ही ऐसी जगह है जहां पर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है । बिना गुरु के यह असंभव है। और आप पृथ्वी लोक पर जाकर भी बिना गुरु बनाएं ही आ गए।


लक्ष्मी माता जी ने कहा आप दोबारा पृथ्वी लोक पर जाएं और गुरु से दीक्षा लेकर आएं अन्यथा आपका यहां आना वर्जित कर दिया जाएगा ।


नारद जी भगवान और माता को प्रणाम करके पुनः पृथ्वी लोक पर जाने के लिए प्रस्थान कर गए।


नारद जी पृथ्वी लोक पहुंचकर विचार करने लगे की माता ने कहा है इसीलिए गुरु तो बनाना ही है। तो उन्होंने विचार किया कि जो सुबह में समुद्र के तट पर सबसे प्रथम व्यक्ति मुझे दिखाई देगा उसे ही मैं अपना गुरु बना लूंगा ।


सुबह सुबह नारद जी सागर तट पर इंतजार कर रहे थे, कि उन्हें सामने से एक मछुआरा आता हुआ दिखाई दिया। उन्होंने तुरंत ही मछुआरे के पैर पकड़कर कहा कि आप आज से मेरे गुरु हो गए और मैं आज से आपका शिष्य हो गया यह कह कर प्रणाम करके लक्ष्मी जी और नारायण को मिलने चले गये।


विष्णु भगवान और माता के पास पहुंचकर नारद जी ने माता जी से कहा माते आपके कहे अनुसार मैं पृथ्वी लोक पर जाकर गुरु से दीक्षा लेकर आ गया। पर माताजी मेरे गुरुजी तो मामूली मछुआरे हैं। वे मुझे क्या ज्ञान देंगे।


इतना सुनते ही विष्णु भगवान क्रोधित हो गए। और उन्होंने तुरंत ही नारद जी को गुरु जी की अवज्ञा करने के कारणाभूत श्राप दे दिया दे कि उन्हे पृथ्वी लोक पर 90 करोड़ यो यो का भोग लेना पडेगा।


नारद जी अपनी भूल पर रोने लगे और उन्होंने माता के चरण पकड़ कर श्राप से बचने का उपाय पूछा तब माता ने कहा कि इस परिस्थिति में आपको सिर्फ आपके गुरु ही बचा सकते हैं।


नारद जी पुन: पृथ्वी लोक पर अपने गुरु के पास पहुंचे, गुरु के चरण स्पर्श कर उन्होंने अपनी सारी व्यथा गुरु जी के समक्ष रख दी ।


गुरु नाम में ही सामर्थ्य भरा पड़ा है, सो तुरंत ही नारद जी को उनकी समस्या का हल गुरु जी ने बता दिया।


गुरु जी की आज्ञा लेकर नारद जी पुनः विष्णु भगवान के पास पहुंचे और उन्हें प्रणाम किया। नारद जी ने कहा प्रभु में आपके दिए हुए श्राप को भोगने के लिए तैयार हूं। पर प्रभु आप मुझे सचित्र समझाइए कि सबसे पहले कौन सा जन्म फिर कौन सा इस तरह मुझे क्रमवार बताइए।


विष्णु भगवान ने रेत के ऊपर सचित्र 90 करोड़ योनि का चित्र बनाकर नारद जी को समझा दिया। नारद जी तुरंत ही उस रेत पर बने चित्र पर लौटने लगे। तब विष्णु भगवान ने नारद जी से पूछा कि वे क्या कर रहे हो।


प्रभु मैं 90 करोड़ योनि का भोग ले रहा हूं, क्योंकि यह 90 करोड भी आप ही की बनाई हुई है और वह 90 करोड़ यौनी भी आप ही की बनाई हुई है ।


नारद जी की चतुराई देखकर विष्णु भगवान प्रसन्न हो गए।


इसीलिए गुरु हमेशा हर हाल में श्रैष्ठ व आदरणीय होता है गुरु की कभी भी अवज्ञा नहीं करनी चाहिए क्योंकि गुरु ही तारणहार है।

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