रामकृष्ण परमहंस के एक शिष्य थे। उनको श्री ठाकुर ने कहा कि प्रत्येक जीव में नारायण का ही वास है। शिष्य ने इस वाक्य को मन में रख लिया।
एक समय एक छोटे से रास्ते पर चलते समय सामने से एक हाथी आता हुआ उसने देखा ! उस हाथीपर बैठा महावत चिल्लाकर पादचारी लोगों को समझा रहा था कि “ हाथी पागल है , मेरे काबू में नहीं है , रास्ते से हट जाओ। ”
शिष्य को प्राणी मात्र में नारायण है , इतनी बात याद थी। हाथी में भी नारायण का वास मानकर उसने उस मस्त हाथी के सामने साष्टांग नमस्कार किया। हाथी पागल तो था ही , उसने अपनी सूंड से उस शिष्य को उठाकर फैंक दिया।
शिष्य को बहुत चोट आयी। ऐसी अवस्था में उसने रामकृष्ण के पास जाकर संपूर्ण किस्सा निवेदन किया और कहा , “ आपने मुझे सत्य नहीं बताया। यदि मुझ में और हाथी में नारायण का ही वास है , तो उस हाथीने मुझे क्यों फैक दिया ? ”
रामकृष्ण ने पूछा , “ हाथी अकेला था या उसपर कोई बैठा था ? और बैठनेवाला चुपचाप था या कुछ बोलता था ? ” शिष्यने उत्तर दिया , “हाथी पर महावत बैठा था और चिल्लाकर कह रहा था कि हाथी पागल है , मेरे काबू में नहीं है। पादचारी रास्ते से हट जाये। ”
रामकृष्ण ने पूछा “ हाथीपर बैठा महावत भी तो नारायण था। तुमने हाथी - नारायण को प्रणाम किया परन्तु उस महावत - नारायण का क्यों नहीं माना ? ”
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