विराट राज्य की एकमात्र तथा रूपवती राजकन्या रत्नावती के विवाह हेतु महाराज इन्द्रजीत ने चार राजकुमारों का चयन किया था। अंतिम परीक्षा यह थी की जो राजपुत्र राजकन्या रत्नावती के साथ भोजन करेगा उसके साथ राजकन्या का विवाह होगा और उसे ही विराट राज्य का उत्तराधिकारी घोषित किया जायेगा।
प्रथम राजकुमार रत्नावती से मिलने आये। परिचय बातचीत के पश्चात् भोजन के लिये बैठे। सामन्य रूप से बढ़िया भोज चल रहा था। राजपुत्र समझ ही नहीं पा रहे थे की भोजन पूरा करने में कठिनाई क्या हो सकती है ?
उसी समय बगल वाले कक्ष से चार भयानक खूंखार कुत्ते राजकुमार की और दौड़ पड़े। अनापेक्षित रूप से कुत्तों का आक्रमण देखकर राजपुत्र की स्थिती डर के कारण दयनीय हो गयी। भोजन करना तो दूर ही रहा लेकिन अपनी जान बचाने की सोचने लगे अर्थात राजपुत्र ने अपनी हार मान ली।
अन्य दो राजपुत्र के साथ भी यहीं हुआ। चौथे राजपुत्र सूर्यसेन भोजन पर बैठे । भोजन शुरू हुआ , निश्चित समय पर कुत्तो ने कक्ष मे प्रवेश किया लेकिन सूर्यसेन ने शांति से अपना भोजन शुरू रखा। राजकन्या रत्नावती , इन्द्रजीत महाराज भी देखते रहे। चारो खूंखार कुत्ते जैसे सूर्यसेन की पास आने लगे तो एक एक रोटी उन्होंने कुत्तों के तरफ फेंकना शुरू किया। रोटी मिलते ही कुत्ते अपने भोजन में लग गए ।
सूर्यसेन कुत्तों को खिलाते रहा और अपना भी भोज करते रहा। थोडे ही समय में सूर्यसेन का भोजन पूर्ण हुआ और कुत्तों के साथ दोस्ती भी। भोजन के बाद कुत्तों के साथ खेलते हुए कक्ष के बाहर आया। सूर्यसेन परीक्षा में उत्तीर्ण हो गए थे। उनका राजकन्या रत्नावती के साथ विवाह हुआ और विराट के उत्तराधिकारी भी बने।
जो व्यक्ति अपने साथ बाकी लोगों का ध्यान रखता है वह सदा विजयी होता है । अपने साथ कुत्तों को खिलाने वाले सूर्यसेन विजयी हुए।
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