वातावरण सुरक्षा मानव जाति का श्रेष्ठ र्कतव्य है। Vatavaran suraksha manav jaati ka shreshth kartavya hai.
एक दिन के दौरान एक व्यक्ति वातावरण में इतना ऑक्सीजन लेता है कि जिस से ऑक्सीजन के तीन सिलेंडर भरे जा सकते हैं।
एक सिलेंडर की कीमत रूपए 700 है। इसका अर्थ यही कि इंसान एक दिन में रूपए 2100 का , एक वर्ष में रुपए 7,66,500 का और उसकी उम्र 65 वर्ष माने तो जीवन के दौरान कुल 5 करोड़ रुपए का ऑक्सीजन वातावरण से ग्रहण करता है और वह भी एक भी रुपया चुकाए बिना ! और यह अक्सीजन मिल रहा है वृक्षों से ।
प्रश्न यह है कि
इंसान पैसे से मिलने वाले गाड़ी , बंगले , फर्नीचर का मूल्य समझता है।
खुराक , पानी , दवाई का मूल्य समझता है।
परंतु ,
जिसके बिना जीवन का टिकना असंभव है , ऐसे मुफ्त में मिल रहे ऑक्सीजन का मूल्य समझ सका है भला ?
शायद नहीं !
वातावरण में किस हद तक प्रदूषण फैल रहा है , कारखानों और फैक्ट्रियों के निर्माण द्वारा उपजाऊ भूमि को जिस तरह से पथरीला बनाया जा रहा है , वृक्षों का जिस प्रकार संहार किया जा रहा है , यह सब देखते हुए यह लगता है कि आज शुद्ध खुराक और शुद्ध पानी जिस तरह दुर्लभ होते जा रहे हैं उस तरह आने वाले कल में शुद्ध हवा भी दुर्लभ हो जाएगी।
शरीर पर लाखों रुपए के गहने हो पर ,
वस्त्र ना हो , ऐसी स्थिति यदि मजाक का कारण बनती है तो तिजोरी में लाखों की संपत्ति हो , करोड़ों के बंगले में लाखों का फर्नीचर हो , कारोबार में टर्न - ओवर करोड़ों का हो पर खाद्य पदार्थ रसायन मिश्रित हो , पानी दूषित हो , शरीर में प्रवेश पाने वाले ऑक्सीजन घातक हो यह स्थिति भी मजाक का कारण ही बनती है।
इतना ही कहूंगा कि धरती पर कोई अदालत हो या ना हो ,
मन में विवेक की अदालत तो होनी ही चाहिए क्योंकि वही एक अदालत ऐसी है कि जहां से दिए जाने वाले प्रत्येक फैसले में सभी के हित को प्रधानता दी हुई होती है।
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