हम अपने दुःखों एवं समस्याओं के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं। Ham Apne dukkho avm samasyaon ke liye swayam hi jimmedar hai
एक दिन ऊंटों का एक कारवां एक धर्मशाला के पास आकर ठहरा। ऊंट वाला एक एक खूंटा गाड़ता जाता और उस के साथ हर ऊंट को बांधता जा रहा था। निन्यानवे खूंटे गाड़ चुका और उतने ही ऊंट बांध चुका था।
पर उस के पास एक खूंटा कम पड़ गया। वह धर्मशाला के व्यवस्थापक के पास गया और उसे अपनी समस्या कह सुनाई। व्यवस्थापक भी खूंटा ढूंढने में असफल रहा।
इस पर ऊंट वाला परेशान हो गया कि इस ऊंट का क्या किया जाए।
इस बीच व्यवस्थापक को कुछ सूझा और उसने ऊंट वाले को एक तरकीब सुझाई। तरकीब के अनुसार उसने ऊंट के पास जाकर झूठमूठ का एक अभिनय किया , जैसे कि वह सचमुच ही खूंटा गाड़ रहा हो। फिर उसने अभिनय किया मानो वह रस्सी से उसे खूंटे के साथ बांध रहा हो।
सुबह ऊंट वाले को आगे जाना था। उसने सभी ऊंटो को खोला तो वे खड़े हो गए और चलने को तैयार हो गए , लेकिन सौवां ऊंट टस से मस नहीं हुआ।
आखिर हारकर वह फिर व्यवस्थापक के पास पहुंचा और उसे अपनी विपदा कह सुनाई। व्यवस्थापक ने उस से कहा - जैसे तुमने बांधने का अभिनय किया था , अब ठीक वैसे ही खोलने का अभिनय करो। तभी वह ऊंट उठेगा।
ठीक वही हुआ। ऊंट वाले ने व्यवस्थापक के बताए अनुसार ठीक वैसे ही किया। अब न केवल ऊंट उठ कर खड़ा हो गया , बल्कि चलने को भी तैयार हो गया।
व्यवस्थापक ने ऊंट वाले से कहा - हमारी स्थिति भी इसी ऊंट जैसी ही है। हम स्वयं को दुनिया से बंधा समझते हैं पर असलियत यह है कि उसी ऊंट की तरह हम कहीं भी बंधे हुए नहीं है , पर भ्रमवश अपने को बंधा हुआ मान रहे हैं। सच्चाई यही है कि अपने कष्टों एवं समस्याओं के लिए स्वयं ही जिम्मेदार हैं।
पूरा जमाना ही इसी ऊंट वाले खूंटे में बंधा हुवा है . शानदार कथानक वाली बोध कथा है . बहु त सुन्दर प्रयास !
ReplyDelete