आंखें बंद करें और सोचे कि
" हमारे सुख के शत्रु कौन हैं ? "
तो हमारे आंखों के समक्ष दरिद्रता , शरीर की रोगिष्ट अवस्था , निष्फलता , उपेक्षा , अपमान इत्यादि तत्व आ जाएंगे , पर वास्तविकता यह है कि हमारे पास सद् विचारों की पूंजी न होने के कारण इन सब तत्वों में हमें " शत्रु " के दर्शन होते हैं।
वरना , यदि सद् विचारों की पूंजी हमारे पास हो तो इनमें से एक भी तत्व ऐसा नहीं है जो हमें प्रसन्नता का अनुभव करने से रोक सके।
याद रखना ,
बाल्टी में पानी वही आता है जो कि नल में होता है पर नल में तो वही पानी आता है जो टंकी में होता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि ,
मन में आने वाले विचार " टंकी " के स्थान पर हैं , जिव्हा पर प्रकट होने वाले शब्द " नल " के स्थान पर हैं और काया में प्रकट होने वाले आचरण " बाल्टी " के स्थान पर हैं।
इसका अर्थ है ?
यही कि यदि तुमने मन को संभाल लिया तो वचन और काया संभल गए समझो और यदि मन को संभालने में तुम कमजोर साबित हो तो समझ लेना कि वचन और काया को संभालने में भी तुम कमजोर ही साबित हो जाओगे।
याद रखना ,
मन की प्रसन्नता में घटनाओं का जितना योगदान होता है वह शायद एक प्रतिशत जितना होता है जबकि उस घटना को जिस नजरिए से देखा जाता है उस का योगदान निन्यानवे प्रतिशत जितना होता है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि घटना पर हमारा कोई अधिकार नहीं है जबकि उसका क्या अर्थ निकाला जाए , उसको किस नजरिए से देखा जाए , उस पर हमारा पूरा - पूरा अधिकार है।
पर मजे की बात यह है कि जिस घटना पर हमारा कोई नियंत्रण प्राय: नहीं होता उस घटना में परिवर्तन करते रहने के लिए हम जद्दोजहद करते रहते हैं।
जबकि घटना को किस नजरिए से देखा जाए इस बात पर हमारा संपूर्ण नियंत्रण होने के बावजूद उस विषय में हम बेदरकार बने रहते हैं।
प्रसन्न रहना है ?
स्वस्थ और मस्त रहना है ?
नजरिए सम्यक रखते रहो , प्रत्येक घटना तुम्हारे मित्र बन जाएगी।
Comments
Post a Comment