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सुख और शांति की खोज ,उसी में है मौज। Sukh aur shanti ki khoj , usi mein hai mauj.


संत सिद्धेश्वर एक दिन एक टीले पर बैठे थे। तभी एक व्यक्ति उनके पास आया और बोला ,





' प्रणाम , मैं सेठ मणिमल हूं। मेरा एक मित्र है सुखीराम। उसका नाम तो सुखीराम है लेकिन उसके जीवन में सुख का अभाव है।





मैं विश्व भ्रमण करके लौट रहा हूं। जब मैंने अपने मित्र से पूछा था कि मैं उसके लिए क्या उपहार लेकर आऊं तो उसने मुझसे सुख और शांति मांगी। मैं समझ नहीं पाया कि ये वस्तुएं उसे कैसे दूं। लेकिन मुझे अच्छा नहीं लगा कि मैं अपने दु:खी मित्र को और निराश करूं सो मैंने सोचा कि उसे उपहार दूंगा अवश्य।





लेकिन कौन सी वस्तु दूं जिससे सुख और शांति प्राप्त हो , यह नहीं समझ सका। उसके पास धन की कोई कमी तो है नहीं फिर उसे क्या दिया जाए , यह समझ में नहीं आ रहा था। मैंने बाजारों की खाक छानी पर कुछ नहीं मिला।





किसी ने आपके पास आने का सुझाव दिया और कहा कि आप मुझे अवश्य सुख और शांति दे सकते हैं। '





संत ने उससे कागज और कलम मांगी। वह उस पर कुछ लिखकर देते हुए बोले , ' इसमें सुख और शांति मौजूद है। लेकिन इसे आप तब तक मत पढ़ना जब तक आपका मित्र इसे न पढ़े क्योंकि यह उसी के लिए है। '





संत की बात सुनकर सेठ सिर झुकाकर बोला , ' जी महाराज , मैं ऐसा ही करूंगा। ' इसके बाद उसने अपने मित्र सुखीराम को वह कागज थमा दिया। कागज में लिखे वाक्य पढ़कर सुखीराम अत्यंत प्रसन्न हो गया और बोला ,





' दोस्त ,





आखिर तुमने मेरी मित्रता निभाई और मेरे लिए सबसे अनमोल वस्तुएं सुख व शांति खोज ही लाए। '





सुखीराम की बात पर सेठ मणिमल ने कागज पढ़ा। उस पर लिखा था , ' अगर मन में विवेक की चांदनी छिटकती हो , संतोष व धैर्य की धारा बहती हो , तो उसमें सुख और शांति का निवास होता है। '





यह पढ़कर सेठ मणिमल बोला , ' वाकई यह उपहार तुम्हारे लिए ही नहीं मेरे लिए भी अनमोल है। '


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