Skip to main content

पाप की मुक्ति तो प्रायश्चित से ही होती है। Paap ki Mukti to praschit se hi hoti hai.


   राजा शर्याति अपने परिवार समेत एक बार वन विहार के लिए गए। एक सुरम्य सरोवर के निकट पड़ाव पड़ा।





बच्चे इधर - उधर खेल , विनोद करते हुए घूमने लगे। मिट्टी के ढेर के नीचे से दो तेजस्वी मणियाँ जैसी चमकती देखीं तो राजकन्या को कुतूहल हुआ। उसने लकड़ी के सहारे उन चमकती वस्तुओं को निकालने का प्रयत्न किया।





किंतु तब उसके आश्चर्य का ठिकाना न रहा जब उन चमकती वस्तुओं में से रक्त की धारा बह निकली।सुकन्या को दुःख भी हुआ और आश्चर्य भी।





      वह कारण जानने के लिए अपने पिता के पास पहुँची। शर्याति ने सुना तो वे स्तब्ध रह गए।





टीले के नीचे च्यवन ऋषि तपस्या कर रहे थे। संभवतः लड़की ने उन्हीं की आँखें फोड़ दी हैं। परिवार समेत राजा वहाँ पहुँचे। देखा वृद्ध च्यवन नेत्रहीन होकर कराह रहे हैं। समाधि उनकी टूट चुकी थी।





पाप की मुक्ति तो प्रायश्चित से ही होती है। इस लक्ष्य को राज्य परिवार ने भली प्रकार समझ रखा था। कायरता क्षमा माँगती है और वीरता क्षतिपूर्ति करने को प्रस्तुत रहती है।





सुकन्या ने अपने अपराध की गुरुता को समझा और उसके अनुसार प्रायश्चित करने का भी साहसपूर्ण निर्णय कर डाला।





राजकन्या ने घोषित किया - वह आजीवन अंधे और वृद्ध च्यवन की धर्मपत्नी बनकर रहेगी। उनकी सेवा को ही अपने पाप का प्रायश्चित मानेगी। ’’  





   घोषणा ने सुकन्या के गौरव को सहस्रों गुना बढ़ा दिया। आत्म‌ - त्याग का इतना बड़ा साहस करने वाली आत्मा का त्याग सचमुच ही महान होना चाहिए। देवता उसे प्रणाम करने आए।





शर्याति का दु:खी मन पुत्री के अनुपम त्याग से हर्ष विभोर हो गया। शरीर कष्टों की चिंता न करते हुए प्रायश्चित की अनुपम परंपरा स्थापित करते हुए च्यवन की क्षतिपूर्ति का जो साहस सुकन्या दिखा सकी उससे उनका मस्तक गर्वोन्नत हो गया।





विवाह की परंपरा पूर्ण हो गई। सुकन्या अंधे और वृद्ध पति को देवता मानकर प्रसन्न मन से धैर्यपूर्वक उनकी सेवा करने लगी।





देवता उस साधना से प्रभावित हुए और अश्विनीकुमारों ने च्यवन की वृद्धता और अंधता दूर कर दी। सुकन्या का जीवन सार्थक हो गया।


Comments

Popular posts from this blog

निंदा - Ninda

निंदा पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

लक्ष्मण को दिया था रावण ने अंतिम संदेश Lakshman ko diya tha ravan ne antim Sandesh

रावण जब मृत्यु शैया पर थे तब राम ने लक्ष्मण से कहा कि, "तुम रावण के पास शीघ्र पहुंचों। उसके पास अमूल्य ज्ञान है, उसे अर्जित करो। उससे जगत के लिए अंतिम संदेश ले आओ।" लक्ष्मण दौड़े। उसने रावण से कहा, "राम रो रहे हैं।" रावण के द्वारा वजह पूछने पर लक्ष्मण ने बताया कि "आपके अंतकाल से व्यथित हुए हैं। मुझे आपके पास अंतिम संदेश प्राप्त करने के लिए भेजा है। बड़े भैया ने कहलवाया है कि "आप अनेक गुणों के भंडार हैं। सीता का अपहरण तो आपकी आकस्मिक (कर्मोदय जनित) भूल थी।" आंख में अश्रु सहित रावण ने कहा कि "मेरे जैसे शत्रु का भी राम गुणकथन करते हैं। इसी लिए राम जगत में भगवान के रूप में पूजे जाते हैं।" अब आपको मेरा अंतिम संदेश यह है, कि" आज की बात कल पर छोड़नी नहीं चाहिए। मेरी इच्छा थी कि मैं स्वर्गगमन के लिए धरती पर सीढी रखूं, जिससे सभी जीव स्वर्गारोहण कर सकें, कोई भी नरक की दिशा में गति न करें, पर वह कार्य अधूरा ही रह गया। मैंने इस काम में विलंब किया और मौत वेग से आगे बढ़ गई। अब अफसोस करने में क्या लाभ। Rich Dad Poor Dad - 20th Anniversa...

मन में उत्पन्न भावों का प्रभाव अत्यंत बलशाली होता है। Maan main utpann bhavo ka prabhav atyant balshali hota hai.

एक हाथी प्रतिदिन पानी पीने के लिए बाजार में से होकर नदी के किनारे पर जाया करता था। मार्ग में दर्जी की दुकान आती थी। दर्जी पशु - प्रेमी था। हाथी जब भी उधर से गुजरता तो उसे खाने के लिए कुछ ना कुछ जरूर देता। हाथी भी खुश हो जाता। वह भी जब पानी पीकर वापस आता तो उद्यान में से पुष्पों को तोड़कर दर्जी की दुकान पर डाल जाता। प्रतिदिन का यह कार्यक्रम बन गया। एक दिन दर्जी किसी कार्य अवश्य बाहर गया हुआ था। दुकान पर उसका बेटा बैठा हुआ था। हाथी प्रतिदिन के कार्यक्रम के अनुसार दर्जी की दुकान पर जाकर अपनी सूंड को लंबा किया। दर्जी पुत्र को पिता के कार्य की जानकारी ना होने से अपनी भावना के अनुसार हाथी की सूंड पर जोर से सुई लगा दी। हाथी चुपचाप वहां से चला गया। हाथी पंचेइंद्रियों प्राणी है। उसके पास मन है। दर्जी पुत्र के दुर्व्यवहार से उसका मन ग्लानि से भर गया। नदी के किनारे पानी को पीया। प्रतिदिन तो उद्यान में जाकर फूलों को तोड़ता था, आज उसने बगीचे में ना जाकर गंदे नाले के पास गया, वहां सूंड में कीचड़ भर लिया। जैसे ही दर्जी की दुकान के पास पहुंचा और कीचड़ से भरी सूंड को उसकी दुकान पर उछाला। दर्जी पुत्र भी...