ऋषभ के साथ आमोद - प्रमोद करने के लिए देव- देवेंद्र- विद्याधर आया करते थे। आज ऋषभ का जन्म - दिवस था। स्वयं देवेंद्र देवलोक की नृत्यांगना नीलांजना के साथ ऋषभ को बधाई देने पहुंचे थे।
ऋषभ और देवेंद्र अपने मित्रों और सहचरों के साथ नीलांजना का भावविभोर नृत्य देख रहे थे। देवेंद्र ने देखा कि ऋषभ इस नृत्य से अभिभूत हुए हैं।
देवेंद्र ने पूछा , ' कैसा लगा ?'
ऋषभ जवाब में मुस्कुरा दिए। तभी देवेंद्र सहमे। नीलांजना नृत्य करते-करते ही जमीन पर गिर पड़ी। ऋषभ और देवेंद्र दोनों के पास दिव्य दृष्टि थी। देवेंद्र ने पाया कि नीलांजना का आयुष्य पूर्ण हो चुका है , पर ऋषभ के आनंद में भंग न हो अतः तत्क्षण अपनी शक्ति से दूसरी नृत्यांगना को उपस्थित कर दिया। वह नृत्य शुरू करने ही वाली थी कि ऋषभ अपने सिंहासन से खड़े हो गए।
देवेंद्र ने पूछा , ' क्या हुआ ?'
ऋषभ ने इतना ही कहा , ' कुछ नहीं हुआ , फिर भी बहुत कुछ हो गया ।'
पूछा , ' मतलब ?'
ऋषभ ने जवाब दिया ' जीवन - बोध '
देवेंद्र कुछ समझ ना पाए। ऋषभ ने कहा , 'नीलांजना की मृत्यु ने वैराग्य की किरण जगा दी। मैं सोच भी नहीं सकता था कि एक दिव्य नृत्यमय जीवन भी इतना नश्वर हो सकता है।'
देवेंद्र ने अपनी ओर से बहुत कुछ समझाने की कोशिश की पर ऋषभ जीवन के वास्तविक सत्य की खोज करने के लिए राजमहलों से निकल पड़े।
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