श्रमण हरिकेशबल चांडाल कुल में उत्पन्न हुए थे। बचपन में जातिवाद के शिकार हुए। उन्हें संसार से घृणा हुई और वे श्रमण बन गए।
एक दिन हरिकेशबल ध्यान में लीन थे। राजकुमारी भद्रा मंदिर में पूजन कर बाहर निकली थी। अचानक भद्रा की नजर हरिकेशबल पर पड़ी। हरिकेशबल का काला - कलूटा शरीर देखकर राजकुमारी घृणा कर बैठी। वह उनकी उज्जवल ता को न पहचान पाई और उन पर थूक दिया।
पास खड़ी सहेली ने कहा , ' राजकुमारी ! तुमने यह क्या किया ? इस संत ने जातिवाद की बेड़ियों को तोड़कर मानवता को प्रतिष्ठित किया है। क्षमा मांग लो इनसे , अन्यथा कुछ भी अहित हो सकता है। इनका अनादर उस ज्योति का अपमान है जो इस संत के अंतरर्दीप मैं प्रज्वलित है।'
' हूं ! मैं और क्षमा मांगू इस काले - कलूटे से ! मेरा कुछ भी अहीत नहीं हो सकता। भला यह श्रमण मेरा क्या बिगाड़ लेगा ?'
वृक्ष पर बैठा हुआ यक्ष सब कुछ देख - सुन रहा था। हरिकेशबल का अपमान उसके लिए असहृ था। उसने निर्णय लिया , राजकुमारी के गर्व को चकनाचूर करने का तथा संत के अपमान का बदला लेने का।
राजमहल पहुंचते ही भद्रा बेहोश हो गई। सारे उपचार निरर्थक गए। राजवैद्य ने कहा , 'राजकुमारी को कोई रोग नहीं बल्कि कुछ ऊपरी प्रभाव है। '
भद्रा के पिता काशी - नरेश कौशलिक ने छानबीन करवाई। राजकुमारी की सखियों से ज्ञात हुआ कि राजकुमारी हरिकेशबल का अपमान किया है। नरेश हरिकेशबल की यौगिक शक्ति से अनभिज्ञ न था। मंत्री के साथ वह संत के पास पहुंचा। उसने चरण वंदना की और निवेदन की भाषा में कहा , ' मुनिश्रेष्ठ ! मेरी पुत्री भद्रा ने अज्ञानवश आपका अपमान किया है। हम इसके लिए क्षमा प्रार्थी हैं। आज वह मृत्यु - शैया पर है। आप क्षमाशील हैं। कृपया मेरी पुत्री को जीवनदान दे। '
हरिकेशबल सहजभाव से बोले , ' राजन ! मैं घटना से अनभिज्ञ हूं और न ही मैं तुम्हारी पुत्री पर क्रध्द हूं। मेरा धर्म तो समता है। संभव है , मेरे भक्त यक्ष ने कुछ किया हो।'
राजा ने यक्ष की पूजा की। वह प्रकट हुआ। नरेश ने यक्ष से भी प्रार्थना , ' यक्ष देव आप प्रसन्न हों , मेरी पुत्री ने जो कुछ किया है , अज्ञानवश किया है। कृपया उसे क्षमा करें , उसे जीवनदान दे।'
यक्ष ने कहा , ' राजन ! ऐसा नहीं हो सकता। तुम्हारी पुत्री ने अपराध किया है। उसने आत्मदर्शी हरिकेशबल पर थूका है। राजन ! याद रखो , सत्ता और संपत्ति कभी संत से ऊपर नहीं होती।'
' यक्ष दैव ! ऐसा न कहें। मैं आपका आजीवन भक्त रहूंगा। क्या भक्त की पुकार आप नहीं सुनेंगे ? आप जो चाहे मुझे दंड दे , पर मेरी पुत्री को स्वस्थ कर दें।'
' राजन ! यद्यपि अपराध अक्षम्य है , पर एक शर्त पर तुम्हारी पुत्री को स्वस्थ कर सकता हूं। राजकुमारी भद्रा उस महाश्रमण को पत्नी के रूप में दान दी जाए।'
पास खड़े मंत्री ने कहा , ' यक्षराज ! यह आप क्या कर रहे हैं ? यह सर्वथा अनुचित है , असंभव है।'
' तब राजकुमारी को मृत्यु की गोद में सोना होगा । '
' नहीं ! यक्षराज ऐसा न कहें। आपकी शर्त में मंजूर करता हूं । ' राजा ने निवेदन भरे शब्दों में कहा।
राजकुमारी स्वस्थ हो गई। राजा ने भद्रा से कहा , ' यक्ष के आदेशानुसार तुम्हें उस महासंत से विवाह करना होगा।'
' क्या कहा ! उस मैले - कुचैले भिक्षु से मैं विवाह करूं ! पिताश्री ! ऐसा कभी न हो पाएगा। '
' मैं स्वयं भी चिंतित हूं इस संबंध में , किंतु में विवश हूं। तुम्हें जीवित रहना है तो उस संत से विवाह करना ही होगा।'
कौशलिक और राजकुमारी भद्रा हरिकेशबल के पास पहुंचे और उन से निवेदन किया ,' मुनिवर ! यक्ष के आदेश से मैं अपनी पुत्री को आपको समर्पित करने आया हूं ।'
हरिकेशबल विस्मित भाव से बोले , ' राजन !तुम यह क्या कह रहे हो ? कहां मैं और कहां राजकुमारी ! फिर मैं तो एक श्रमण हूं । मेरे लिए विवाह असंभव है , धर्मविरुद्ध है । आप अपनी पुत्री का विवाह किसी अन्य से कर दें। आपने यक्ष के आदेश का पालन कर लिया , अतः अब राजकन्या का अहित नहीं होगा।'
राजकुमारी भद्रा मुनि के व्यवहार से आश्चर्यचकित थी। जिस व्यक्ति का रूप ऐसा कुत्सित , उसके विचार इतने निर्मल ! कुछ क्षण में मुनि ध्यान में लीन हो गए। भद्रा ने देखा ध्यानस्थ संत के अन्तस्तल से बाहर निकलते सत्य के सौंदर्य को , माटी के दीये में जलती पावन ज्योति को।
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