भगवान बुद्ध निर्वाण के करीब थे। शिष्य आनंद की आंखों से आंसू झर रहे थे। उन्हें कुछ दूरी पर अंधेरा दिखाई दे रहा था। आनंद ने बुद्ध की रोशनी में थी अब तक यात्रा की थी। सुबह - शाम , रात - दिन एक क्षण भी वे बुद्ध से दूर ना हुए थे। तीस वर्ष ऐसे साथ रहे , जैसे उनकी छाया।
निर्वाण की घड़ी को करीब देख बुद्ध ने सभी भिछुओं को एकत्र होने का निर्देश दिया। सांझ ढलने के करीब थी। सभी भिछु जैतवन में एकत्र थे। अर्हत् ने धीमी आवाज में कहा , ' बिछुओं ! आज की रात मेरे लिए अंतिम रात है। अगर कुछ पूछना है तो पूछ लो। '
सभी भिछु प्रज्वलित दीप थे। वे परम अनुगृह से भरे थे , अत: शांत रहें। अर्हत् ने देखा , सभी बिछुओं को गहन शांति में , अहोभाव में। पर आनंद विचलित हो गए। उन्हें ऐसा लगा मानो ज्योति हाथ से छिटक रही है , सहारा छूट रहा है। उन्होंने कहा , ' बन्ते ! आप यह क्या कह रहे हैं ? कृपया ऐसी बात ना कहें। '
बुद्ध ने कहा , ' आनंद ! विदाई का क्षण तो आता ही है। तुम प्रकाश में जीना चाहते हो। आनंद ! अब तक का प्रकाश उधार का था , अब स्वयं प्रकाशवाही बनो। देखो उन्हें जो ज्योति - स्वरूप हो गए हैं। शांत बैठे हैं , अपने स्थान पर। काश ! तुम भी राग - मुक्त होकर ज्योति - स्वरूप हो पाते। '
आनंद कुछ बोल पाए। उन्होंने अपना शीश बुद्ध के चरणों में समर्पित किया। बुध्द ने उनके शीश पर हंस्त - युगल रखा और कहा , ' अप्प दीपो भव । '
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