दार्शनिक मौलुंकपुत्र तथागत बुद्ध के पास गया और पूछा , ' क्या ईश्वर है ?
बुद्ध ने कहा , ' तुम्हारे प्रश्न का उत्तर अवश्य दूंगा , पर पहले यह बताओ कि यह तुम्हारी बौध्दिक उपज है या सत्य जानने का प्रयास। '
मौलुंकपुत्र ने कहा , ' बौद्धिक खुजलाहट बहुत कर चुका हूं। अब तो सत्य से साक्षात्कार करना चाहता हूं। '
' तो फिर तुम क्या कुछ दांव पर लगा सकोगे ?' बुद्ध ने प्रश्न - सूचक लहजे में पूछा।
मौलुंकपुत्र ने कहा , ' मैं सब कुछ लगा दूंगा दांव पर क्योंकि जैसे आप क्षत्रियपुत्र हैं , वैसे ही मैं भी क्षत्रियपुत्र हूं ! क्षत्रिय , क्षत्रिय को चुनौती न दे।
बुद्ध बोले , ' मौलुंकपुत ! चुनौती मेरा जीवन है। क्या ईश्वर है ? अगर इस प्रश्न का समाधान पाना है तो दो वर्ष तुम्हें मौन रखना पड़ेगा , यहीं पर ; तब तक न कोई प्रश्न और न ही कोई समाधान। जब दो वर्ष पूर्ण हो जाएंगे मौन को , तो मैं स्वयं ही पूछ लूंगा और तुम्हारे प्रश्न का समाधान दे दूंगा। क्या तुम तैयार हो ? '
' क्या दो वर्ष तक निरंतर मौन ? मौलुंकपुत्र पहले तो चौंका। पर बाद में कहने लगा , 'भगवान , अगर आप जान रहे हैं तो अभी बताने में क्या आपत्ति है ? '
बुद्ध ने कहा , ' पात्रता का निर्माण करना होगा। उल्टे पात्र पर अगर अमृत भी डाल दिया जाए तो वह व्यर्थ ही जाता है। तू धैर्य से काम ले। मैं मात्र उत्तर ही नहीं देता , उपचार भी देता हूं और दो वर्ष का मौन , यही उपचार है और तुम्हारे लिए यही औषधि है। '
मौलुंकपुत्र कुछ बोल न पाया। वह चुप बैठा रहा , पूर्णतया मौन और इसी मौन ने उसे अंतरगुहा में प्रवेश करा दिया। दो वर्ष बीत गए , पर वह तो अतीत को विस्मृत ही कर बैठा था।
एक दिन बुद्ध ने मौलुंकपुत्र से कहा , ' क्या हुआ वत्स , क्या दो वर्ष अभी पूर्ण नहीं हुए हैं ?'
मौलुंकपुत्र हंसने लगा और बोला , " भगवान , आपकी औषधि काम कर गई। मुझ में ही दीप जल उठा है।मौन में मेरे अंतरस्वर मुखरित हो उठे हैं। मेरा पांडित्य गिर गया है , प्रज्ञा के नयन खुले हैं और इसी मौन प्रज्ञा ने मेरे प्रश्नों का समाधान तो क्या , मुझे प्रश्न से ही मुक्त भी कर दिया है । "
' मैं शांत हूं मेरी यह शांति ही......'
' बुद्धत्व है ', किसी चिड़िया ने यह बोल बोले और आसमान में उड़ गई। मौलुंकपुत्र ने देखा , बुद्ध मुस्कुरा रहे थे।
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