राजा ने संतो और महंतों के लिए एक दिन विशेष भोज का आयोजन किया। भोजन उपरांत राजा ने घोषणा की , ' मैं अपने नगर के बाहर प्रबुद्ध पुरुषों का एक उपनिवेश बसाना चाहता हूं ।
राजधानी के बाहर , झील के पीछे जंगल में जो जितनी भूमि घेरना चाहे , घेर ले और अपनी चार -दीवारी बना ले । जो जितनी भूमि घेर पाएगा , वह उसी की हो जाएगी । यह भी स्मरण रहे कि जिसका घेरा जितना बड़ा होगा , वही राजगुरु के पद पर प्रतिष्ठित होगा। '
सभी संत और ज्ञानी अपनी-अपनी घेराबंदी करने लगे। आकांक्षा थी , राजगुरु बनने की। सबने अपनी सारी धनराशि घेराबंदी करने में खर्च कर दी । नियत दिन पर स्वयं राजा उनके बीच गया।
कहा , ' ब्राह्मणों ! किसका घेरा ज्यादा बड़ा है ? सूचित करें । मैं उसको राजगुरु बनाना चाहता हूं । '
अचानक ब्राह्मणों की टोली में से संत सारस्वत उठे और कहने लगे , ' जितने लोगों ने जमीन की घेराबंदी की है , उनमें सबसे बड़ा घेरा मेरा है। '
नो केवल राजा अपितु सभी ज्ञानी संत उनके वक्तव्य को सुनकर आश्चर्यचकित हुए। उनकी गरीबी से कोई भी अपरिचित न था । वस्त्रों के नाम पर उनके पास मात्र एक लंगोटी थी । लोग यह भी जानते थे कि उसने केवल घास - फूस की छोटी -सी पाल ही बांधी है । उपस्थित ज्ञानियों ने समझा कि सारस्वत पागल हो गया है।
चूंकि सारस्वत ने दावा किया था ,अतः राजा को भूमिनिरीक्षण के ले जाना ही पड़ा । चारों और कई लोगों की पक्की दीवारें खड़ी कर अपनी - अपनी भूमि की घेराबंदी कर रखी थी। सबकी चार -दीवारी का निरीक्षण करते -करते राजा उस स्थान पर भी पहुंच गया जहां सारस्वत ने घेरा-बंदी कर रखी थी । उनके साथ में सैकड़ों ब्राह्मण भी थे। उन्होंने देखा , वहां दीवार के नाम पर केवल राख पड़ी थी । क्योंकि सारस्वत ने घास -फूस की चार-दीवारी बनाकर भी उसमें आग लगा दी थी ।
सारस्वत ने कहा , ' राजन ! मेरा घेरा सबसे बड़ा है , क्योंकि मेरा कोई घेरा नहीं है। असीम को वही पा सकता है , जिसने सीमाएं तोड़ दी है। '
राजा ने सारस्वत के चरण पकड़ लिए और कहा , ' सचमुच राजगुरु बनने का अधिकारी वही है , जिसने गिरा दी है सीमाएं , पंथ की , संप्रदाय की और जाति की। '
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