Skip to main content

अहंकार ही माया है ahankar hi Maya hai



अधिकतर लोग ईश्वर की सत्ता को मानते हैं , फिर क्या वजह है कि लोग यह मानते हुए भी उसे देख नहीं पाते ? इसका जवाब यह है कि उन लोगों को ईश्वर इसलिए दिखाई नहीं देता , क्योंकि माया का आवरण मनुष्य के ऊपर पड़ा होता है।





जैसे सूर्य सबको प्रकाश और ऊष्मा देता है , लेकिन यदि वह बादलों से घिर जाए , तो अपना काम नहीं कर पाता। माया का पर्दा भी इसी प्रकार है।





अब प्रश्न यह है कि यह माया है क्या ?





माया है हमारा अहंकार।






अहंकार के रूप में यह माया बिल्कुल सूर्य के सामने आ गए मेघ की तरह ही है। इसी के कारण हम ईश्वर को नहीं देख पाते।





इसे इस तरह समझो कि अगर मैं अपने अंगोछे की ओट कर लूं , तो तुम मुझे नहीं देख सकते , लेकिन सच्चाई यह है कि मैं तुम्हारे बिल्कुल नजदीक हूं।





इसी तरह ईश्वर भी हमारे बहुत निकट है , किंतु अहंकार रूपी आवरण के कारण हम उसे नहीं देख पाते। क्योंकि जब अहंकार रहता है , तब न ज्ञान होता है , न मुक्ति मिलती है।






अहंकार के कारण घमंड आता है। हांडी में रखे दाल , चावल , पानी या आलू को हम तभी छू सकते हैं , जब तक उसे आग पर न रखा जाए। जीव की देह भी हांडी की तरह है।





धन , मान-सम्मान , विद्या-बुद्धि , जाति-कुल आदि उन दाल , चावल और आलुओं की तरह हैं। अहंकार वह आग है , जो इनमें शामिल होकर उन्हें तप्त कर देती है। अहंकार रूपी अग्नि के कारण जीव गर्म (गर्वीला या घमंडी) होता है।






मैं (स्वयं को महत्वपूर्ण समझने ) का भाव जब तक पूरी तरह समाप्त नहीं हो जाता , मनुष्य को मुक्ति नहीं मिलती। उसकी गति बछड़े जैसी हो जाती है।





जन्मते ही वह हम्बा (हम ) करके बोलता है। उसे हल में जोता जाता है , तो कभी वह कसाई का शिकार बन जाता है , उसकी खाल से जूते और ढोल बनाए जाते हैं। तब भी उसका अहंकार नहीं जाता। ढोल को पीटा जाता है , तब भी वह हम-हम करके ही बजता है। जब तांत बनती है , तब धुनिया उससे रूई धुनता है , तब वह तुम-तुम करके बजती है। वह हम से तुम पर आ जाता है। मैं से तुम पर आ जाने से ही अहंकार से मुक्ति मिलती है।






'अहंकार ' या 'मैं ' दो तरह का होता है। एक कच्चा मैं और दूसरा पक्का मैं। मैं जो कुछ देखता , सुनता या महसूस करता हूं , उसमें कुछ भी मेरा नहीं है , यहां तक कि यह शरीर भी मेरा नहीं है





मैं नित्यमुक्त हूं , ज्ञान-स्वरूप हूं। यह विचार पक्का मैं है , यह भक्ति और ज्ञान का मैं है , जो सकारात्मक है।





वहीं यह मेरा मकान है , यह मेरी पत्नी है‌ , यह मेरा शरीर है , यह कच्चा मैं है। यही माया है। जो अहंकार मनुष्य को कामिनी-कंचन में आबद्ध करता है , वह नकारात्मक है।






दरअसल , मैं और मेरा , यह अज्ञान का भाव है। तुम और तुम्हारा - यही ज्ञान है। जो सच्चा भक्त होता है , वह कहता है - जो कुछ भी कर रहे हो , वह तुम्हीं कर रहे हो , मेरा तो कुछ भी नहीं है। मैं तो तुम्हारे लिए कर्म कर रहा हूं।






मैं सिर्फ एक छोटा-सा शब्द है , इसे दूर करना अत्यंत कठिन है , लेकिन असंभव भी नहीं।





शंकराचार्य का एक शिष्य था। वह कई दिनों से उनकी सेवा में था , लेकिन आचार्य ने उसे कोई उपदेश नहीं दिया था। एक दिन शंकराचार्य अपने आसन पर बैठे थे। किसी के आने की आहट हुई। आचार्य ने पूछा - कौन है ? शिष्य बोला - मैं। तब आचार्य ने कहा- यदि तुझे मैं इतना ही प्रिय है , तो तू इसे और भी बढ़ा ले। अर्थात सारा जगत मैं ही हूं , यह धारणा कर ले। या फिर इसे पूरी तरह त्याग दे।






यदि कोशिश करने से मैं नहीं जाता , तो उसे दास बना लो। इस भाव में रहो कि मैं दास हूं। ईश्वर का दास हूं , भक्त हूं। ऐसे मैं में कोई दोष नहीं। मिठाई खाने से अम्लदोष होता है , पर मिश्री इसका अपवाद है। इसी तरह यह मैं बुरा नहीं। दास का मैं , भक्त का मैं और बालक का मैं जलराशि पर खींची हुई रेखा के समान हैं , जो ज्यादा देर नहीं टिकते।






जीव और बहृम में भेद बस इसीलिए है कि उनके बीच मैं खड़ा हुआ है। पानी में लाठी डाल दी जाए , तो पानी दो भागों में बंटा हुआ दिखाई देता है। अहं या मैं ही वह लाठी है। इसे उठा लो , तो पानी एक हो जाएगा। जीव और ब्रहृम् आपस में मिल जाएंगे।






Amzaon SellerBooks

Audible SellerAudible

Pharmacy

Clothing


Comments

Popular posts from this blog

जिनके साथ हम रहेंगे वैसे ही बन जाएंगे। Jinke sath ham rahenge vaise hi ban jaenge

प्राय: स्कूल या कॉलेज से मित्रता की शुरुआत होती है। हम जिन लोगों के बीच रहते हैं, अपना अधिकांश समय व्यतीत करते हैं, उनसे हमारा परिचय होता है, संबंध प्रगाढ़ होते हैं, मित्रता बढ़ती है और हमको लगता है कि यह सब हमारे मित्र हैं, क्या वे वाकई हमारे मित्र हैं, हम अपना विवेक जगाएं और देखें कि क्या वाकई वे सभी हमारी मित्रता के लायक हैं ? अगर किसी में कोई कुटेव है तो आप तुरंत स्वयं को अलग कर लें, नहीं तो वे आदतें आपको भी लग जाएंगीं। अगर आपको सिगरेट पीने की आदत पड़ चुकी है तो झांकें अपने अतीत में। आपको दिखाई देगा कि आप विद्यालय या महाविद्यालय में पढ़ते थे, चार मित्र मिलकर एक सिगरेट लाते थे और किसी पेड़ की ओट में आकर सिगरेट जलाते और एक ही सिगरेट को बारी-बारी से चारों पीते थे। पहले छुप-छुपकर, फिर फिल्म हॉल में गए तब, फिर इधर-उधर हुए तब, फिर बाथरूम में पीने लगे और धीरे-धीरे सब के सामने पीने लगे। इस तरह पड़ी जीवन में एक बुरी आदत और आपने उन्हीं लोगों को अपना मित्र मान लिया, जिन लोगों ने आपके जीवन में बुरी आदत लगाई। अगर आप गुटखा खाते हैं तो सोचे कि इसकी शुरुआत कहां से हुई। जरूर आपकी किसी ऐसे व्यक्ति ...

बड़प्पन उम्र से नहीं अच्छे कर्मों से सिद्ध होता है badappan umra se nahin acche karmon se siddh hota hai

बड़ा तो गधा भी हो जाता है और कुत्ता भी हो जाता है, गुंडा भी हो जाता है और दुर्जन भी हो जाता है, चोर भी हो जाता है और व्यभिचारी भी हो जाता है। मात्र समय व्यतीत होता है और यह सभी बड़े हो जाते हैं। परंतु, यह " बड़प्पन " न तो गौरवप्रद बनता है और न ही किसी के लिए आलंबन रूप बनता है। परंतु…… एक बड़प्पन ऐसा है कि जिसका संबंध समय के साथ नहीं, पर सत्कार्यों के साथ है। उम्र के साथ नहीं, पर विवेक के साथ है। यह बड़प्पन गौरवप्रद भी बनता है और अनेकों के लिए आलंबन रूप भी बनता है। एक सनातन सत्य हमें आंखों के सामने रखना है और वह यह है कि   जिंदगी की लंबाई बढ़ाने के लिए हम कुछ भी नहीं कर सकते लेकिन हमारे हाथ में यह दो चीजें हैं - जिंदगी की चौड़ाई हम बढ़ा सकते हैं, जिंदगी की गहराई हम बढ़ा सकते हैं। जीवन को यदि हम सत्कार्यों से महका रहे हैं तो हमारे जीवन की चौड़ाई बढ़ रही है और उन सत्कार्यों के फल - स्वरुप यदि हमारे मन की प्रसन्नता बनी रहती है तो हमारे जीवन की गहराई बढ़ रही है। पर कैसी दयनीय दशा है हमारी ? जीवन की इस जिस लंबाई को बढ़ाने में स्वयं परमात्मा को भी सफलता नहीं मिली उस लंबाई को बढ़ाने ...

कल की चिंता में वर्तमान समय को व्यर्थ ना गवाएं cal ki chinta mein vartman samay ko vyarth Na gavan

" रात गई बात गई " जो इस भाव में जीता है उसके पास भला तनाव कहां से आएगा ? रात की बात को सुबह लाना और सुबह की बात को रात तक खींच कर ले जाना ही तो चिंता का बसेरा बसाना है । अगर आप जी सकें तो वर्तमान में जीने की कोशिश कीजिए। जो जैसा मिला है उसे जिया जाए‌। जैसे आप अपने घर में खूंटियों पर कपड़े लटकाते हैं वैसे ही उन खूंटियों पर अतीत की यादें लटका दें, भविष्य की कल्पनाओं को लटका दें और आप वर्तमान में जिएं। जो वर्तमान में जीता है जैसी व्यवस्था मिलती है उसे स्वीकार कर लेता है, वह चिंतामुक्त है। कोठरी का भी स्वागत करो और कोठी का भी स्वागत करो। वर्तमान में जीते हुए प्रकृति के सानिध्य में रहने की कोशिश करें। प्रकृति जो कर देती है वही ठीक है। चिंता करने से जीवन के संयोग नहीं बदलते। चिंताओं से समस्या का समाधान भी नहीं निकला करता। अच्छा होगा चिंता करने के बजाय चिंतन करें, निर्णय लें तदनुसार कार्य करें, परिणाम जो आए उसका स्वागत करें। एक अन्य काम और करें कि जीवन में घटी दुर्घटनाओं को अधिक तवज्जो ना दें। उठा-पटक हर किसी की जिंदगी में होती है तभी तो आदमी को "समझ" आती है। लेकिन जो ब...