फलेरा नाम के धनी व्यक्ति के घर में एक अनपढ़ लड़का बर्तन मांजने का काम करता था। उसे जब भी फुर्सत मिलती , वह पास के एक मूर्तिकार के यहां चला जाता। वहां मूर्तियां बनते और पत्थर कटते वह बहुत ही ध्यान से देखता।
अपनी लगन के कारण मूर्तियों को देख-देखकर ही मूर्तियां बनाने में कुशल हो गया। एक दिन उसके मालिक ने नगर के प्रतिष्ठित व्यक्तियों और राज्य के बड़े-बड़े अधिकारियों को दावत पर बुलाया।
हॉल के मध्य एक बड़ी मेज रखी हुई थी जिसे मुख्य बैरे ने सजाया था पर सजावट करते हुए उससे कुछ ऐसी गलती हो गई कि वह हताश हो गया।
बर्तन मांजने वाले लड़के ने जब मुख्य बैरे की हालत देखी तो उससे बोला , ' यदि आप आज्ञा दें तो मैं प्रयास करके देखूं। '
मुख्य बैरा वहां से हट गया। लड़का तुरंत अपने कार्य में जुट गया। उसके दिमाग में क्या था , किसी को मालूम नहीं था। उसने तुरंत ढेर सारा मक्खन मंगाया और जमे हुए मक्खन से चीते की आकर्षक मूर्ति बना दी।
मूर्ति देख वहां के सभी बैरे वाह-वाह कर उठे। विशिष्ट मेहमान आने लगे। आगंतुकों में एक मूर्तिकला का विषेशज्ञ भी था। वह मूर्ति के सौंदर्य से अभिभूत था।
उसने मुख्य बैरे से पूछा , ' यह मूर्ति किसने बनाई है ? ' बैरे ने उस लड़के को उसके सामने लाकर खड़ा कर दिया।
मूर्ति विषेशज्ञ ने कहा - ' यह मूर्ति कलाकारी का श्रेष्ठ नमूना है। यदि तुम आगे मूर्तिकला की शिक्षा नियमित लो तो देखना एक दिन तुम बेहतरीन मूर्तिकार बन सकते हो। '
इतना सुनते ही उसका मालिक खुश हो गया और उसने घोषणा की कि उसकी मूर्तिकला की शिक्षा का खर्चा वह वहन करेगा।
वह लड़का सोचने लगा कि श्रम और समय का सदुपयोग कभी भी व्यर्थ नहीं जाता। यही बर्तन मांजने वाला लड़का एंटोनियो कैनोवा आगे चलकर विश्वप्रसिद्ध मूर्तिकार के रूप में जाना गया।
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