सफलता के साथ शांति चाहिए तो अपने लिए भी जीएं । आज आप कितना भी काम कर लीजिए , लेकिन शाम को घर लौटते समय एक बेचैनी साथ लेकर ही जाएंगे।
काम बहुत कर रहे हैं लेकिन संतुष्टि नहीं है। लोग सफलता की अंधी दौड़ में दौड़ तो रहे हैं , मनचाहा पैसा भी कमा रहे हैं लेकिन इस सब के बीच कुछ चीज हम खोते जा रहे हैं , वो है हमारे भीतर की मौलिकता , मासूमीयत , अपने भीतर का आनंद और संवेदनाएं।
कर्म कीजिए , ये आपके लिए जरूरी है लेकिन रोजमर्रा की जिंदगी में से कुछ समय ऐसे कामों के लिए हो जो आपके निजी जीवन के लिए हो। ये कर्म ही हमारे अंतर्मन को संतुष्टि का भाव देंगे।
हर काम केवल परिणाम के लिए किया जाए , फायदे के लिए किया जाए , ये ठीक नहीं। कुछ काम कभी-कभी यूं ही किया कीजिए।
अपने जीवन में से कुछ समय अपनी निजता के लिए निकालें। कुछ समय खुद को भी दें। इस समय का उद्देश्य लाभ का भाव नहीं , आत्म संतुष्टि का भाव होना चाहिए।
थोड़ा मेडिटेशन करें , वो काम करें जो आपके भीतर मरती जा रही प्रतिभा को जीवित रखे , जैसे संगीत , चित्रकारी या आपका कोई और शौक।
कभी-कभी किसी मंदिर में जाकर थोड़ी देर आंखें मूंदकर बैठें। किसी गरीब , असहाय की मदद करें। ये काम आपको वो शांति , वो संतुष्टि देंगे , जिसकी आप तलाश कर रहे हैं।
महाभारत में कर्ण का व्यक्तित्व इसका आदर्श उदाहरण है , कर्ण का सारा दिन भले ही दुर्योधन जैसे व्यक्ति के कर्मों में सहभागिता करने में गुजरता , लेकिन उसकी दिनचर्या में सूर्य की उपासना , असहायों की सेवा , धनुर्विद्या का अभ्यास भी शामिल था। यह काम कर्ण का नितांत निजी काम था।
खुद के कल्याण , संतुष्टि और संवेदनाओं के लिए। हम भी कुछ काम सिर्फ खुद के लिए करें। ऐसा आवश्यक नहीं है कि जो किया जाए , वो लाभ के लिए ही हो। खुद के लिए किया गया काम आपको भीतर से रिचार्ज करता है , शक्ति देता है।
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