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महामुनि ने जब एक चुहिया को कन्या बना डाला mahamuni ne jab ek chuhiya ko kanya banaa dala

एक महान तपस्वी एक दिन गंगा में नहाने के लिए गए। स्नान करके वह सूर्य की पूजा करने लगे। तभी उन्होंने देखा कि एक बाज ने झपट्टा मारा और एक चुहिया को पंजे में जकड़ लिया। तपस्वी को चुहिया पर दया आ गई। उन्होंने बाज को पत्थर मारकर चुहिया को छुड़ा लिया। चुहिया तपस्वी के चरणों में दुबककर बैठ गई। तपस्वी ने सोचा कि चुहिया को लेकर कहाँ घूमता फिरुँगा , इसको कन्या बनाकर साथ लेकर चलता हूँ। तपस्वी ने अपने तप के प्रभाव से चुहिया को कन्या का रूप दे दिया। वह उसे साथ लेकर अपने आश्रम पर आ गए। तपस्वी की पत्नी ने पूछा - ‘ उसे कहाँ से ले आए ? ’ तपस्वी ने पूरी बात बता दी। दोनों पुत्री की तरह कन्या का पालन - पोषण करने लगे। कुछ दिनों बाद कन्या युवती हो गई। पति - पत्नी को उसके विवाह की चिंता सताने लगी। तपस्वी ने पत्नी से कहा - ‘ मैं इस कन्या का विवाह भगवान सूर्य से करना चाहता हूँ । ’ पत्नी बोली - ‘ यह तो बहुत अच्छा विचार है। इसका विवाह सूर्य से कर दीजिए । ’ तपस्वी ने सूर्य भगवान का आवाहन किया। भगवान सूर्य उपस्थित हो गए। तपस्वी ने अपनी पुत्री से कहा - ‘ यह सारे संसार को प्रकाशित करने वाले भगवान सूर्य हैं। क्या तुम ...

बाबा बन्दा सिंह बहादुर जी का बलिदान Baba Banda Singh Bahadur ji ka balidan hello

बाबा बन्दा सिंह बहादुर का जन्म कश्मीर स्थित पुंछ जिले के तहसील राजौरी क्षेत्र में भारद्वाज गोत्र के ब्राह्मण कुल में हुआ। विक्रम संवत् 1727, कार्तिक शुक्ल 13 (1670 ई.) 9 जून को हुआ था। उनका वास्तविक नाम लक्ष्मणदेव था। लक्ष्मण देव के भाग्य में विद्या नहीं थी , लेकिन छोटी सी उम्र में पहाड़ी जवानों की भांति कुश्ती और शिकार आदि का बहुत शौक़ था। वह अभी 15 वर्ष की उम्र के ही थे कि युवावस्था में शिकार खेलते समय उन्होंने एक गर्भवती हिरणी पर तीर चला दिया। इससे उसके पेट से एक शिशु निकला और तड़पकर वहीं मर गया। यह देखकर उनका मन खिन्न हो गया। उन्होंने अपना नाम माधोदास रख लिया और घर छोड़कर तीर्थयात्रा पर चल दिये। अनेक साधुओं से योग साधना सीखी और फिर नान्देड़ में कुटिया बनाकर रहने लगे। इसी दौरान गुरु गोविन्दसिंह जी माधोदास की कुटिया में आये। उनके चारों पुत्र बलिदान हो चुके थे। उन्होंने इस कठिन समय में माधोदास से वैराग्य छोड़कर देश में व्याप्त मुस्लिम आतंक से जूझने को कहा। इस भेंट से माधोदास का जीवन बदल गया। गुरुजी ने उसे बन्दा बहादुर नाम दिया। फिर पाँच तीर , एक निशान साहिब , एक नगाड़ा और एक हुक्मन...

भगवान् का न्याय कितना निष्पक्ष है, कितना सूक्ष्म है। Bhagwan ka nyay Kitna nishpaksh, kitna sukshm hai.

माण्डव्य ऋषि तपस्या में लीन थे। उधर से कुछ चोर गुजरे। वे राजकोष लूट कर भागे थे। लूट का धन भी उनके साथ था। राजा के सिपाही उनका पीछा कर रहे थे। चोरों ने लूट का धन ऋषि की कुटिया में छिपा दिया और स्वयं भाग गये। सिपाही जब वहाँ पहुँचे तो चोरों की तलाश में कुटिया के भीतर गये। चोर तो नहीं मिले पर वहाँ रखा धन उन्हें मिल गया। सिपाहियों ने सोचा कि निश्चित ही बाहर जो व्यक्ति बैठा है, वही चोर है। स्वयं को बचाने के लिये साधु का वेष बना, तपस्या का ढोंग कर रहा है। उन्होंने ऋषि को पकड़ लिया और राजा के सामने ले जाकर प्रस्तुत किया। राजा ने भी कोई विचार नहीं किया और न ही पकड़े गये अभियुक्त से कोई प्रश्न किया और सूली पर लटकाने की सजा सुना दी। माण्डव्य ऋषि विचार करने लगे कि ऐसा क्यों हुआ ? यह उन्हें किस पाप की सजा मिल रही है ? उन्होंने अपने जीवन का अवलोकन किया , कहीं कुछ नहीं मिला। फिर विगत जीवन का अवलोकन किया। देखते - देखते पूरे सौ जन्म देख लिये , पर कहीं उन्हें ऐसा कुछ नहीं दिखाई दिया जिसके परिणाम स्वरूप यह दण्ड सुनाया जाता। अब उन्होंने परमात्मा की शरण ली। आदेश हुआ , ‘ ऋषि अपना १०१ वाँ जन्म देखो। ’ ऋषि न...

भगवान विष्णु के परम भगत नारद का गर्व हरण Bhagwan Vishnu ke Param Bhagat Narad ka Garv haran

एक दिन , विष्णु लोक में नारद मुनि का आगमन होने पर भगवान श्री विष्णु ने उनसे पूछा , ‘‘ देवर्षि , आप जब पृथ्वी पर जाते हैं , तब वहां मेरे भक्तों से मिलते हैं ? वहां हमारा एक प्रिय भक्त रहता है ! ’’ यह बात सुनकर नारद मुनि सोच में पड गए । उन्हें लगा , ‘ हमसे अधिक खरा भक्त और कौन हो सकता है ? ’ खरे भक्त को देखने के लिए नारद मुनि ने भगवान श्री विष्णु से उस भक्त का संपूर्ण पता पूछ लिया तथा वे पृथ्वी पर बताए हुए स्थान पर आए । श्री विष्णु द्वारा बताया गया उनका खरा भक्त एक सामान्य किसान था । यह देखकर नारद मुनि अचंभित रह गए । दिन भर किसान क्या कर रहा है , वे यह देखते रहे । किसान भोर होने पर उठता था , भगवान जी का नाम स्मरण करता था , दिन भर खेत में काम करता था तथा रात में सोते समय प्रार्थना कर सो जाता था , हे भगवन , आपकी कृपा से मैं मेरा काम कर सका । आपकी कृपा से आज का पूरा दिन सफल भला व्यतीत हो पाया है । आपकी ऐसी ही कृपा मुझ पर सदैव रहने दें । ’ नारद मुनि को यह बात हास्यास्पद , मजेदार एवं उपहासपूर्ण लगी । यह किसान दिनभर में केवल एक बार नाम लेता है तथा प्रार्थना करता है । हम तो अखंड परमेश्...

सौंदर्य की कामना छोड़ सादगी पूर्वक जीवन जीना चाहिए। Soundarya ki Kamna chhod sadgi purvak jivan jina chahie.

लोपामुद्रा ने अपने पति अगस्त्य मुनि से कुछ आभूषणों की प्रार्थना की। ऋषि असमंजस में पड़े , पर अपनी पत्नी की कामना पूर्ण करने के लिए उन्होंने अपने शिष्यों के पास जाने में हर्ज न समझा और दूसरे दिन कुछ शिष्यों के साथ लेकर श्रुतर्वा राजा के पास चल दिए। राजा ने उनका समुचित सत्कार करके पधारने का कारण पूछा तो ऋषि ने अपना अभिप्राय कह सुनाया। साथ ही यह भी कहा कि जो धन धर्मपूर्वक कमाया है और उचित कामों में खर्च करने से बचा हो उसी को मैं लूँगा। श्रुतर्वा ने महर्षि को कोषाध्यक्ष के पास भेज दिया ताकि वे हिसाब जाँच कर देख सकें कि उनका इच्छित धन है या नहीं। अगस्त्य मुनि ने हिसाब जाँचा तो समस्त राज्य - कोष धर्म उपार्जित कमाई का ही पाया पर साथ ही उचित कार्यों का खर्च भी इतना रहा कि उसमें बचत कुछ भी न थी। जमा खर्च बराबर था। ऋषि वहाँ से चल दिए और राजा धनस्व के यहाँ पहुँचे और उसी प्रकार अपना अभिप्राय कह सुनाया। उसने भी श्रुतर्वा की तरह हिसाब जाँचने की प्रार्थना की। जाँचा गया तो वहाँ भी संतुलन ही पाया गया। अगस्त्य मुनि वहाँ से भी बिना कुछ लिए ही चल दिए। इसी प्रकार वे अपने कई अन्य धनी समझे जाने व...

मरने से सभी डरते हैं , मरना कोई नहीं चाहता। Marne se sabhi darte Hain, marna koi nahin chahta.

राजा परीक्षित को भागवत् सुनाते हुए जब शुकदेव जी को छह दिन बीत गए और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर वह क्षुब्ध हो रहा था। शुकदेव जी ने परीक्षित को एक कथा सुनाई - राजन बहुत समय पहले की बात है , एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला , रात्रि हो गई वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूरी पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बीमार बहेलिए की झोंपड़ी देखी। वह चल - फिर नहीं सकता था। इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने लिए जानवरों का माँस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी , छोटी , अँधेरी और दुर्गंधयुक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर उस बहेलिए से अपनी कोठरी में रातभर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की। बहेलिए ने कहा - आश्रय के...

मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है।Madhur vyavhar se badhkar Shatru ko jitne wala aur koi hathiyar is Prithvi per nahin hai.

एक राजा ने एक दिन स्वप्न देखा कि कोई परोपकारी साधु उससे कह रहा है कि बेटा ! कल रात को तुझे एक विषैला सर्प काटेगा और उसके काटने से तेरी मृत्यु हो जायेगी। वह सर्प अमुक पेड़ की जड़ में रहता है , पूर्व जन्म की शत्रुता का बदला लेने के लिए वह तुम्हें काटेगा। प्रातःकाल राजा सोकर उठा और स्वप्न की बात पर विचार करने लगा। धर्मात्माओं को अक्सर सच्चे ही स्वप्न हुआ करते हैं। राजा धर्मात्मा था , इसलिए अपने स्वप्न की सत्यता पर उसे विश्वास था। वह विचार करने लगा कि अब आत्म - रक्षा के लिए क्या उपाय करना चाहिए ? सोचते - सोचते राजा इस निर्णय पर पहुँचा कि मधुर व्यवहार से बढ़कर शत्रु को जीतने वाला और कोई हथियार इस पृथ्वी पर नहीं है। उसने सर्प के साथ मधुर व्यवहार करके उसका मन बदल देने का निश्चय किया। संध्या होते ही राजा ने उस पेड़ की जड़ से लेकर अपनी शय्या तक फूलों का बिछौना बिछवा दिया , सुगन्धित जलों का छिड़काव करवाया , मीठे दूध के कटोरे जगह - जगह रखवा दिये और सेवकों से कह दिया कि रात को जब सर्प निकले तो कोई उसे किसी प्रकार कष्ट पहुँचाने या छेड़ - छाड़ करने का प्रयत्न न करे। रात को ठीक बारह बजे सर्प अपनी बा...