मानव को मृत्यु का दु:ख नहीं राग और ममता का दु:ख है। Manav ko mrutyu Ka dukh Nahin raag aur Mamta ka dukh hai
भगवान महावीर स्वामी जी की वाणी भव के बंधन को तोड़ने वाली है, परंतु अभी तक इस वाणी से ने हमारे अन्तहृदय को स्पर्श नहीं किया है। यदि स्पर्श किया होता तो हमारी आत्मा जन्म मरण के दु:खों से मुक्त हो गई होती।
संसार में दु:ख का कारण वस्तु और व्यक्ति नहीं परंतु दु:ख का कारण आसक्ति है, हमारी राग दशा है। मानव चाहे तो ममता के बंधन को तोड़ सकता है परंतु प्रयत्न ही नहीं करता। भ्रमर में ऐसी शक्ति है कि वह कठोर से कठोर लकड़ी को भी छेद सकता है परंतु वही भ्रमर जब कमल की कोमल पंखडियों में कैद हो जाता है तो उसे भेद कर बाहर नहीं निकल सकता। पराग के राग के कारण वह कैद में ही रहना पसंद करता है। उत्तराध्ययन में प्रभू वाणी कहती है……………..
" रागो य दोसो विय कम्म बीयं "
राग और द्वेष कर्मबंध के बीज है। जब तक राग है तब तक कर्मबंध भी है। आज मानव को मृत्यु का दु:ख नहीं राग और ममता का दु:ख है। मरते तो दुनिया में बहुत हैं पर अपना व्यक्ति जब दुनिया से जाता है दुःख तभी होता है।
एक बार एक सेठ का नौकर छुट्टी लेकर अपने घर गया। जब वापस आने लगा तो सोचा कि रास्ते में हमारे सेठ की बेटी का गांव आता है उसे भी मिलता जाऊं। जब उसे मिल कर वापिस सेठ के पास घर पहुंचा तो जोर-जोर से रोने लगा। सेठ ने पूछा - अरे रोता क्यों है ? बोला - सेठ जी ! बेटी मर गई है ऐसा कह कर पुनः जोर - जोर से रोने लगा। सेठ बोला - अरे इसमें क्या हो गया । यह तो संसार का नियम है । जो जन्म लेता है वह एक दिन अवश्य जाता है अतः तू समता रख।क्या तुम्हें दुनिया से नहीं जाना ? नौकर लंबा सांस लेकर बोला - मेरी नहीं आपकी ! मैं रास्ते में आते-आते बहन को मिलने गया तो मुझे वहां पर पता लगा। अतः मैंने शीघ्र ही आपको आकर सूचना दी। अपनी बेटी का सुनते ही सेठ मूर्छित होकर गया। सारे घर में हाहाकार मच गया। नोकर सोचने लगा कि अब कहां गई समता। वस्तुतः उपदेश देना आसान है आचरण करना ही कठिन है।
संसार में जीव तीन प्रकार के होते हैं।
१- आसक्त
२- विरक्त
३- वीतराग
इस काल में वीतराग नहीं बनते तो कोई बात नहीं विरक्त तो बन सकते हैं। ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती आसक्त रहा तो नर्क गया। मेघ कुमार, धन्ना, शीलभद्र विरक्त थे तो देव लोक में गए। जो वीतराग थे वे मोक्ष में गए। आसक्त व्यक्ति बहिरात्मा होते हैं, विरक्त अन्तरात्मा होते हैं और वीतराग परमात्मा होते हैं।
बाह्य दृष्टि से द्वेष भयंकर लगता है परंतु तत्व दृष्टि से राग भयंकर है। देह के रोग से कम व्यक्ति पीड़ित नजर आते हैं, परंतु राग के रोग से सारा संसार पीड़ित है। इस राग के रोग ने चरम शरीर व्यक्तियों को भी नहीं छोड़ा। अत: राग की आग को ज्ञान और वैराग्य रूपी पानी से बुझाने का प्रयत्न करना चाहिए।
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