आप किस को राजी करना चाहते हो आपके पास वाले को या प्रभु को ? Aap kis ko Raji karna chahte ho aapke paas wale ko yah Prabhu ko ?
दुनिया से बात करने के लिए फोन की जरूरत होती है,
प्रभु से बात करने के लिए मौन की जरूरत होती है।
फोन से बात करने के लिए बिल देना पड़ता है,
ईश्वर से बात करने के लिए दिल देना पड़ता है।
आप किस को राजी करना चाहते हो आपके पास वाले को या प्रभु को ? मेहनत ज्यादा किसमें लगानी पड़ती है ?हमेशा राजी कौन रह सकता है ?
इन सब का जवाब खुद से पूछना।
बौद्ध भिक्षुक किसी नदी के पनघट पर गया, पानी पी कर पत्थर पर सिर रखकर सो गया। पनघट पर पनिहारी आती - जाती रहती हैं, तो तीन-चार पनिहारीने जल के लिए आई तो एक पनिहारीन ने कहा - आहा ! साधु हो गया फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही लेकिन रखा तो है।
पनिहारीन की बात साधु ने सुन ली। उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया। दूसरी बोली - साधु हुआ लेकिन खींज नहीं गई। अभी रोष नहीं गया तकिया पत्थर फेंक दिया। तब साधु सोचने लगा ? अब क्या करें ? तब तीसरी पनिहारी बोली - बाबा यह तो पनघट है यहां तो हमारी जैसी पनिहारी आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेगी। उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे ? लेकिन चौथी पनिहारी ने बहुत ही सुंदर और एक अद्भुत बात कह दी। साधु जी क्षमा करना हमको लगता है आपने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है अभी तक वही का वही बना हुआ है, दुनिया पाखंडी भी कहे तो कहे आप जैसे भी हैं हरि नाम जपते रहें।
सच तो यही है कि दुनिया का काम ही कहने का है। ऊपर से देख कर चलोगे तो कहेंगे अभिमानी हो गया है। नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे किसी के सामने देखता ही नहीं। आंखें बंद कर दोगे तो कहेंगे कि ध्यान का नाटक कर रहा है, चारों और देखोगे तो कहेंगे निगाहों का ठिकाना नहीं, निगाहे घूमती ही रहती है। परेशान होकर आंखें फोड़ लोगे तो दुनिया कहेगी किया हुआ भोगना ही पड़ता है। अब बताओ दुनिया को खुश करने के लिए आप कुछ भी कर लो अंत में वह कहीं ना कहीं से दोष निकाल ही देंगी।
दूसरों को समझाना बुद्धिमानी है,
खुद को समझाना असली ज्ञान है।
दूसरों को काबू करना बल है,
खुद को काबू करना वास्तविक शक्ति है।
जिसने संसार को प्रसन्न करने की कोशिश की वह हार गया,
जिसने खुदा को राजी करने की ठान ली वह जीत गया।
ऊपर वाले को राजी करने के लिए हमें सिर्फ कुछ क्षण अपनी जिंदगी से निकालने है, इसी मैं वह राजी हो जाता है। जिससे हमारी कीमत भी बढ़ जाती है।
एक बच्चा जब तेरह साल का हुआ तो उसके पिता ने उसे एक पुराना कपड़ा देकर उसकी कीमत पूछी। बच्चा बोला ₹100, तो पिता ने कहा कि उसे बेचकर ₹200 लेकर आओ। बच्चे ने उस कपड़े को अच्छे से धोया और अच्छे से उस कपड़े को फोल्ड लगा कर रख दिया। अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया। जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा ₹200 में बिका।
कुछ दिन बाद उसके पिता ने उसे वैसा ही कपड़ा वापस दिया और उसे ₹500 में बेचने को कहा। इस बार उस बच्चे ने अपने पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े पर सुंदर चित्र बनाकर रंगवा दिया और एक गुलजार बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया। एक व्यक्ति
ने उस कपड़े को ₹500 में खरीदा और उसे ₹100 इनाम भी दिए।
जब बच्चा वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दिया और उसे ₹2000 में बेचने को कहा। इस बार बच्चे को पता था कि कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है, उसके शहर में मूवी शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थी। बच्चा उस कलाकार के पास पहुंचा उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए।
ऑटोग्राफ लेने के बाद बच्चे ने उसी कपड़े की बोली लगाई बोली 2000 से शुरू हुई और एक व्यापारी ने वह कपड़ा ₹12000 में ले लिया। रकम लेकर जब वह बच्चा घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने पूछा - इतने दिनों से कपड़े बेचते हुए तुमने क्या सीखा ?
बच्चा बोला - पहले खुद को समझो, खुद को पहचानो, फिर पूरी लगन से मंजिल की ओर बढ़ो क्योंकि जहां चाह होती है, राह अपने आप निकल आती है।
पिता बोले तुम बिलकुल सही हो मगर मेरा ध्येय भी तुमको यह समझाना था, कि कपड़ा मेला होने पर भी उसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धोकर साफ करना पड़ा, फिर और ज्यादा कीमत मिली तब उस पर एक पेंटर ने उसे अच्छे से रंग दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उसने अपनी नाम की मुहर लगा दी। तो विचार करें जब इंसान इस निर्जीव कपड़े को अपने हिसाब से उसकी कीमत बढ़ा सकता है, तो फिर वो मालिक जिसके हम बाल - बच्चे हैं क्या वह हमारी कीमत कम होने देगा ?
इंसान को मानव भव रूपी कपड़ा मिला हुआ है, उस कपड़े को त्याग के द्वारा, संयम तप के द्वारा साफ करो कीमत बढ़ जाएगी। फिर सुंदरमय चरित्र आचरण ग्रहण करो और कीमत बढ़ जाएगी, फिर प्रभु के नाम की छाप लगा दो सब कुछ तू ही है मेरे प्रभु, गुरु की मोहर से और कई गुना कीमत बढ़ जाती है। बस समर्पण, प्रसन्न, खुश राजी रखने की भावना पैदा होने चाहिए। उनके रंगों में रंगना चाहिए।
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प्रभु से बात करने के लिए मौन की जरूरत होती है।
फोन से बात करने के लिए बिल देना पड़ता है,
ईश्वर से बात करने के लिए दिल देना पड़ता है।
आप किस को राजी करना चाहते हो आपके पास वाले को या प्रभु को ? मेहनत ज्यादा किसमें लगानी पड़ती है ?हमेशा राजी कौन रह सकता है ?
इन सब का जवाब खुद से पूछना।
बौद्ध भिक्षुक किसी नदी के पनघट पर गया, पानी पी कर पत्थर पर सिर रखकर सो गया। पनघट पर पनिहारी आती - जाती रहती हैं, तो तीन-चार पनिहारीने जल के लिए आई तो एक पनिहारीन ने कहा - आहा ! साधु हो गया फिर भी तकिए का मोह नहीं गया। पत्थर का ही सही लेकिन रखा तो है।
पनिहारीन की बात साधु ने सुन ली। उसने तुरंत पत्थर फेंक दिया। दूसरी बोली - साधु हुआ लेकिन खींज नहीं गई। अभी रोष नहीं गया तकिया पत्थर फेंक दिया। तब साधु सोचने लगा ? अब क्या करें ? तब तीसरी पनिहारी बोली - बाबा यह तो पनघट है यहां तो हमारी जैसी पनिहारी आती ही रहेंगी, बोलती ही रहेगी। उनके कहने पर तुम बार-बार परिवर्तन करोगे तो साधना कब करोगे ? लेकिन चौथी पनिहारी ने बहुत ही सुंदर और एक अद्भुत बात कह दी। साधु जी क्षमा करना हमको लगता है आपने सब कुछ छोड़ा लेकिन अपना चित्त नहीं छोड़ा है अभी तक वही का वही बना हुआ है, दुनिया पाखंडी भी कहे तो कहे आप जैसे भी हैं हरि नाम जपते रहें।
सच तो यही है कि दुनिया का काम ही कहने का है। ऊपर से देख कर चलोगे तो कहेंगे अभिमानी हो गया है। नीचे देखकर चलोगे तो कहेंगे किसी के सामने देखता ही नहीं। आंखें बंद कर दोगे तो कहेंगे कि ध्यान का नाटक कर रहा है, चारों और देखोगे तो कहेंगे निगाहों का ठिकाना नहीं, निगाहे घूमती ही रहती है। परेशान होकर आंखें फोड़ लोगे तो दुनिया कहेगी किया हुआ भोगना ही पड़ता है। अब बताओ दुनिया को खुश करने के लिए आप कुछ भी कर लो अंत में वह कहीं ना कहीं से दोष निकाल ही देंगी।
दूसरों को समझाना बुद्धिमानी है,
खुद को समझाना असली ज्ञान है।
दूसरों को काबू करना बल है,
खुद को काबू करना वास्तविक शक्ति है।
जिसने संसार को प्रसन्न करने की कोशिश की वह हार गया,
जिसने खुदा को राजी करने की ठान ली वह जीत गया।
ऊपर वाले को राजी करने के लिए हमें सिर्फ कुछ क्षण अपनी जिंदगी से निकालने है, इसी मैं वह राजी हो जाता है। जिससे हमारी कीमत भी बढ़ जाती है।
एक बच्चा जब तेरह साल का हुआ तो उसके पिता ने उसे एक पुराना कपड़ा देकर उसकी कीमत पूछी। बच्चा बोला ₹100, तो पिता ने कहा कि उसे बेचकर ₹200 लेकर आओ। बच्चे ने उस कपड़े को अच्छे से धोया और अच्छे से उस कपड़े को फोल्ड लगा कर रख दिया। अगले दिन उसे लेकर वह रेलवे स्टेशन गया। जहां कई घंटों की मेहनत के बाद वह कपड़ा ₹200 में बिका।
कुछ दिन बाद उसके पिता ने उसे वैसा ही कपड़ा वापस दिया और उसे ₹500 में बेचने को कहा। इस बार उस बच्चे ने अपने पेंटर दोस्त की मदद से उस कपड़े पर सुंदर चित्र बनाकर रंगवा दिया और एक गुलजार बाजार में बेचने के लिए पहुंच गया। एक व्यक्ति
ने उस कपड़े को ₹500 में खरीदा और उसे ₹100 इनाम भी दिए।
जब बच्चा वापस आया तो उसके पिता ने फिर एक कपड़ा हाथ में दिया और उसे ₹2000 में बेचने को कहा। इस बार बच्चे को पता था कि कपड़े की इतनी ज्यादा कीमत कैसे मिल सकती है, उसके शहर में मूवी शूटिंग के लिए एक नामी कलाकार आई थी। बच्चा उस कलाकार के पास पहुंचा उसी कपड़े पर उनके ऑटोग्राफ ले लिए।
ऑटोग्राफ लेने के बाद बच्चे ने उसी कपड़े की बोली लगाई बोली 2000 से शुरू हुई और एक व्यापारी ने वह कपड़ा ₹12000 में ले लिया। रकम लेकर जब वह बच्चा घर पहुंचा तो खुशी से पिता की आंखों में आंसू आ गए। उन्होंने पूछा - इतने दिनों से कपड़े बेचते हुए तुमने क्या सीखा ?
बच्चा बोला - पहले खुद को समझो, खुद को पहचानो, फिर पूरी लगन से मंजिल की ओर बढ़ो क्योंकि जहां चाह होती है, राह अपने आप निकल आती है।
पिता बोले तुम बिलकुल सही हो मगर मेरा ध्येय भी तुमको यह समझाना था, कि कपड़ा मेला होने पर भी उसकी कीमत बढ़ाने के लिए उसे धोकर साफ करना पड़ा, फिर और ज्यादा कीमत मिली तब उस पर एक पेंटर ने उसे अच्छे से रंग दिया और उससे भी ज्यादा कीमत मिली जब एक नामी कलाकार ने उसने अपनी नाम की मुहर लगा दी। तो विचार करें जब इंसान इस निर्जीव कपड़े को अपने हिसाब से उसकी कीमत बढ़ा सकता है, तो फिर वो मालिक जिसके हम बाल - बच्चे हैं क्या वह हमारी कीमत कम होने देगा ?
इंसान को मानव भव रूपी कपड़ा मिला हुआ है, उस कपड़े को त्याग के द्वारा, संयम तप के द्वारा साफ करो कीमत बढ़ जाएगी। फिर सुंदरमय चरित्र आचरण ग्रहण करो और कीमत बढ़ जाएगी, फिर प्रभु के नाम की छाप लगा दो सब कुछ तू ही है मेरे प्रभु, गुरु की मोहर से और कई गुना कीमत बढ़ जाती है। बस समर्पण, प्रसन्न, खुश राजी रखने की भावना पैदा होने चाहिए। उनके रंगों में रंगना चाहिए।
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