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न्याय से कमाया धन ही सुख देता है। Nyaay se kamaya dhan hi sukh deta hai.

किसी गांव में "धन" नामक सेठ रहता था। उसके परिवार में मात्र तीन सदस्य थे। उसकी पत्नी धन्ना, पुत्र घनसार और खुद। धन सेठ लोभी और ध्रुर्त प्रकृति का था। गांव में भोली भाली प्रजा को वह व्यापार में ठगता था। अनाज में कंकर, गुड में मिट्टी, दाल में लकड़ी के छिलके आदि मिलाकर बेचता था। ग्रामीण उसकी चिकनी चुपड़ी बातों का विश्वास भी कर लेते थे। नई चीज को पुरानी और पुरानी चीज को नई बताकर ज्यादा मूल्य से चीज बेचता और वजन से भी लोगों को ठगता था। लोगों से ठगाई करके सेठ को ज्यादा रकम मिलती वह किसी न किसी कारण से नष्ट हो जाती, कभी आग लगने से, कभी चोरी से और कभी किसी अन्य कारणों से मगर नुकसान जरूर होता था।
विधाता के विधान में अन्याय नाम की कोई चीज नहीं होती। जो जैसा करता है, उसे वैसा ही भुगतना पड़ता है। "सौ सुनार की एक लोहार की" सेठ ठग - ठग कर धन बटोरता है तो कुदरत अपना खेल दिखा भी देती है। सेठ को इस बात का ख्याल कभी नहीं आया। सेठ का फला फूला संसार था। उसके लड़के ने शादी की तो एक सदस्य और भी बढ़ा ।
सेठ की दुकान और घर एक ही मकान में था। इसीलिए दुकान में जो कोई बात होती घर तक सुनाई देती थी। एक दिन बहू के कान में यह बात आई कि धन सेठ को किसी ने "बंचक सेठ" कहा बहु ने ऐसा शब्द कई बार सुना था पर ध्यान नहीं दिया था। आज पहली बार उसने अपने पति को बुलाकर पूछा कि लोग ससुर जी को ऐसा क्यों कहते हैं ? सेठ के पुत्र धनसार ने सहज भाव से पिता के काले कारनामे अपनी पत्नी को कह सुनाएं। सुनकर पत्नी को बहुत बुरा लगा क्योंकि वह न्याय की पक्षधर थी, अन्याय से धन इकट्ठा करने वालों से वह सख्त नफरत करती थी। पर आज वह दुविधा में पड़ गई कि ससुर जी से कैसे कहें ? और न कहे तो अन्यायोउचित धन का समर्थन हो जाता है।
समय पाकर बहु ने ससुर जी से प्रार्थना की कि पिताजी आप अन्याय से धन न कमाकर, न्याय मार्ग से क्यों नहीं अपना लेते ? आपको लोग बंचक सेठ कहें और आप सुनते रहे, मुझे बुरा लगता है। लोगों का विश्वास जीतने के लिए आपको न्याय नीति का रास्ता अपनाना होगा। लोगों का विश्वास आप जीत लेते हैं तो अन्याय से जो आप कमाते हैं, उससे ज्यादा धन कमाएंगे ? ऊपर से आपकी ख्याति भी बढ़ेगी। मैंने सुना है धन आप कमाते भी हैं और नुकसान भी करते हैं। अगर आप मुझे अपनी बेटी मानते हैं तो एक बार मेरा कहना मान कर देखिए….। आप थोड़े ही दिनों में धन भी कमा लेंगे और ख्याति भी।
आज के व्यापारी वर्ग का यही रोना है। अनीति से कमाई के पीछे लाख मेहनत करते हैं पर न्याय से धन कमाने की जरा भी कोशिश नहीं करते।
पुत्रवधू के कहने से धन सेठ ने अपनी वृत्ति बदल डाली। अन्याय के सारे धंधे छोड़कर न्याय से धन कमाने का संकल्प किया। थोड़े ही दिनों में सेठ जी ने तरक्की की - न्याय से धन कमाने से धन वृद्धि के साथ उनकी धवल कीर्ति भी बढ़ने लगी। छह महीने में सेठ ने पांच किलोग्राम सोना कमाया। बहू मुस्कुराती हुई बोली पिताजी ! पांच किलोग्राम सोना आपकी सच्ची संपत्ति है, न्याय का धन संपत्ति है, अन्याय का धन विपत्ति है। कहा भी है -" सम्यक प्रतिपति: = संपत्ति" अर्थात न्यायपूर्ण एवं सही तरीके से जो प्राप्त होती है वह संपत्ति है।
सेठ जी के मन में आज पहली बार अलौकिक खुशियां लहरा रही हैं। इस तरह की खुशी सेठ को पहले कभी नहीं हुई थी। सेठ आज अंदर बाहर दोनों तरफ से खुश है। सेठ ने अपनी पुत्रवधू के सामने सोने की थैली रख दी। पुत्रवधू ने कहा पिताजी - न्याय संचित धन आपसे कोई नहीं छीन सकता। अगर आप चाहे तो परीक्षा कर लीजिए। पुत्रवधू के कहने से सेठ जी ने अपने पुत्र के द्वारा सोने को चमड़े की थैली में मुहर लगाकर बंद करवा दिया और राजमार्ग पर रखवा दिया। रास्ते में आने जाने वालों ने थैली तो देखी पर किसी ने उसकी उसको हाथ भी नहीं लगाया। सेठ के पुत्र ने तीन दिन बाद थैली को घर ले आया। बहू ने कहा इसे तालाब में डाल दो। सेठ के पुत्र ने वैसा ही किया। तदनंतर देवयोग से वह थैली मछुआरों के जाल में फंसी, मछुआरों ने थैली पर सेठ का नाम देखकर सेठ के घर छोड़ दी। दौलत की दो लात - दौलत को आप लात मारो तो भी वह आपका पीछा करती है। अगर आप उसका पीछा करते हैं तो दौलत दो लात मार कर चली जाती है। सेठ जी को अपनी पुत्रवधू पर पूरा भरोसा हो गया। थोड़े ही दिनों में सेठ जी की ख्याति और सिद्धि ऐसी बड़ी की सब सेठ जी की गुणगान करने लगे।


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