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युधिष्ठिर की राजपाट त्याग की शिक्षा । Yudhistir ki Rajpath Tyag ki ichha

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, कौरवो का संहार हो गया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा , "धर्मराज ! युद्ध समाप्त हो गया है ,और साथ ही साथ धर्म की विजय हुई ।अधर्मीयो का नाश हुआ है, अब आप राज्याभिषेक की तैयारी करें राज्य की लगाम अपने हाथों में ले। युधिष्ठिर ने कहा प्रभु हजारों लाखो छत्रिय युवकों का रक्त बहा है। अपने कितने स्वजन इस युद्ध में स्वाहा हो गए हैं ,अब मुझे वैराग्य आ रहा है मुझे राज सिंहासन पर नहीं बैठना है । सोच रहा हूं कि थोड़े दिन गंगा किनारे चला जाऊं और एकांत में तपस्या करू, ध्यान भजन करू, प्रायश्चित करके अपने अंदर के कर्मों का नाश करू निर्मल होकर फिर शांति से राज करो। श्री कृष्ण मुस्कुराए," पांडु पुत्र फिर आप शांति से राज नहीं कर सकेंगे क्योंकि अब कलयुग का आगमन हो रहा है, उसके लक्षणों की झलक देखनी हो तो आप पांचों भाई अलग अलग दिशा में चले जाओ, वहां पांचों को आश्चर्य दिखाई देंगे आप लोग चले जाओ वहां से लौट आने पर इस विषय में शाम को बात करेंगे पांचो पांडव पांच दिशा में निकल गए । सर्वप्रथम युधिष्ठिर में दो सूंड वाला हाथी देखा उसे देखकर धर्मराज दंग रह गए...

सत्संग की महिमा -satsang ki mahima

एक मजदूर था, और संतों का प्यारा था ,सत्संग का प्रेमी था, उसने एक प्रतिज्ञा की थी, कि जब भी किसी का सामान उठाएगा या उसकी मजुरी करेगा तब उस यजमान को वह सत्संग सुनाएगा या उस यजमान से वह सत्संग सुनगा । मजदूरी करने से पहले ही वह यह नियम सामने वाले यजमान को बता देता था और उसकी मंजूरी होने पर ही काम करता था। एक बार एक सेठ आया उसने सामान उठाने को कहा, मजदूर जल्दबाजी में अपना नियम भूल गया ,और सामान उठाकर सेठ के साथ चलने लगा, आधे रास्ते जाने के बाद मजदूर को अपना नियम याद आया तो उसने बीच रास्ते में ही सामान उतार कर रख दिया और सेठ से कहा - सेठ जी मेरा नियम है, कि आप मुझे सत्संग सुनाएं या मैं आपको सुनाउ तभी मैं सामान उठाउंगा । सेठ को जरा जल्दी थी इसीलिए सेठ ने कहा भाई तू ही सुना मैं सुनता हूं । मजदूर के अंदर छुपा संत जाग गया और सत्संग के प्रवचन धारा बहना शुरू हो गई। सफर सत्संग सुनते सुनते कट गया । सेठ के घर पहुंचते ही सेठ ने मजदूर का पैसा अदा कर दिया । मजदूर ने पूछा - क्यों सेठ जी ,सत्संग याद रहा । मैंने तो कुछ नहीं सुना, मुझे जल्दी थी, और आधे रास्ते आने के बाद में दूसरा मजदूर कहां खोजने जाऊं , इसल...

गुरु ही तारणहार है - guru hi taranhara hai

एक बार नारद जी भगवान लक्ष्मी नारायण के दर्शन हेतु पहुंचे। भगवान ने नारद जी से कुशलता पूछी और उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। नारद जी ने बताया कि वह पृथ्वी लोक पर भ्रमण करके आ रहे है। लक्ष्मी माता ने कहा नारद जी ,आपने पृथ्वी लोक पर गुरु से दीक्षा ली या नहीं। नारद जी ने कहा नहीं माता इस पर लक्ष्मीजी माता ने कहा कि पृथ्वी लोक ही ऐसी जगह है जहां पर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है । बिना गुरु के यह असंभव है। और आप पृथ्वी लोक पर जाकर भी बिना गुरु बनाएं ही आ गए। लक्ष्मी माता जी ने कहा आप दोबारा पृथ्वी लोक पर जाएं और गुरु से दीक्षा लेकर आएं अन्यथा आपका यहां आना वर्जित कर दिया जाएगा । नारद जी भगवान और माता को प्रणाम करके पुनः पृथ्वी लोक पर जाने के लिए प्रस्थान कर गए। नारद जी पृथ्वी लोक पहुंचकर विचार करने लगे की माता ने कहा है इसीलिए गुरु तो बनाना ही है। तो उन्होंने विचार किया कि जो सुबह में समुद्र के तट पर सबसे प्रथम व्यक्ति मुझे दिखाई देगा उसे ही मैं अपना गुरु बना लूंगा । सुबह सुबह नारद जी सागर तट पर इंतजार कर रहे थे, कि उन्हें सामने से एक मछुआरा आता हुआ दिखाई दिया। उन्होंने तुरंत ही मछुआरे के पै...

निष्काम गुरु सेवा Nishkaam Guru Seva

वैदिक काल में सुभाष नाम का एक विद्यार्थी गुरुदेव के चरणों में विद्या अध्ययन करने गया। विद्या के साथ में पूरी तन्मयता के साथ में गुरु भक्ति में लग गया। ऐसी गुरु भक्ति की ऐसी गुरु सेवा की, कि गुरू के हृदय में बस गया। गुरु का हृदय जीत लिया। विद्या उपार्जन के बाद जब अपने घर जाने के लिए निकला गुरु जी ने कहा,"बेटा आपने मेरा दिल जीत लिया है, पर हम तो साधारण साधु हैं।हमारे पास धन-दौलत राज्य सत्ता कुछ नहीं है अब तुझे क्या दूं बेटा जिससे तेरा कल्याण हो जाए ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी छाती का एक बाल उखाड़ कर उसे देते हुए कहा - बेटा ले इसे प्रसाद समझकर संभाल के रख ले। जब तक यह तेरे पास रहेगा धन - वैभव - संपत्ति -लक्ष्मी की कोई कमी नहीं रहेगी। गुरुदेव," आपने मुझे पहले ही सब कुछ दे दिया है।" वह तो है ! फिर भी मेरी खुशी के लिए रख ले। सुभाष ने खूब आदर पूर्वक बाल को रख लिया।उसकी सेवा पूजा करता था। घर में सुख शांति समृद्धि का वास हो गया वह धनवान हो गया उसकी ख्याति चारों तरफ फैल ने लग गई। सुभाष के पड़ोसी ने देखा और सोचा यह भी विद्या ग्रहण करके आया है , और मैं भी विद्या ग्रहण करके आया हूं, औ...

जीतने में जो आनंद नहीं - वह जिताने में है । - Jeetne main woh anand nahi jo jitaane main hai

खरगोश कछुए के पास आया और उससे एक बार फिर दौड़ने की प्रतियोगिता करने को कहा । उसने कहा कि उसके एक पूर्वज ने पहले दौड में हारकर उनकी बिरादरी का नाम नीचा कर दिया था । वह उस दौड को जीतकर नई पीढ़ी का नाम रौशन करना चाहता था । कछुआ तैयार हो गया । निश्चित दिन और समय पर जंगल के राजा शेर ने दौड़ शुरू करवाई । खरगोश ने दौड़कर लगभग पूरा रास्ता मिनटों में पार कर लिया । वह अंतिम रेखा से केवल सौ कदम दूर था । वह सांस लेने के लिए रुका । उसने सोचा कि वह कछुए को देखते ही दौड़ पूरी कर लेगा । लेकिन रुकने पर उसकी नींद लग गई । कोई पन्द्रह मिनट के बाद ,कछुआ वहां पहुंचा। खरगोश के पास पहुंचकर कछुआ कुछ देर रुका और सोचा... फिर उसने खरगोश को नींद से जगाया और बोलो," तुम क्या कर रहे हो ? क्या तुम्हें तुम्हारे पूर्वज द्वारा तुम्हारी बिरादरी का नाम नीचा कर देना याद नही ? क्या तुम्हें नही पता कि तुम्हारे यहां सोने से हमारी नई पीढ़ी को कितनी समय शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी ? उठो, और बाकी दौड़ पूरी करो । मैं भी आता हूं।" खरगोश अचरज में पड़ गया । उसने कहा," फिर कुछ, जब तुम खुद दौड़ जीत सकते थे, तो तुमने मुझे क्य...

चरण सुंदर : आचरण सुंदर – Charan sunder : aacharan sunder

रामायण का एक प्रसंग है - राम और सीता चित्रकूट में बैठे हैं। बैठे-बैठे राम ने कहा - सीते ! देखो मेरी चरण कितनी सुंदर है । सीता बोली - प्रभु ! लेकिन मेरे चरण तो आप से भी सुंदर है। राम बोले - नहीं, मेरे चरण ज्यादा सुंदर है। सीता बोली - नहीं ,भगवान ! मेरे चरण आप से भी ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके चरण तो श्याम है और मेरे गोरे हैं । सीता का अपना तर्क था। राम - सीता दोनों में संवाद छिड़ गया । विवाद नहीं, संवाद। विवाद तो दो अज्ञानियों के बीच होता है जबकि संवाद दो ज्ञानियों में होता है । बुद्धि से बुद्धि टकराती है विवाद होता है और हृदय से हृदय मिलता है तो संवाद होता है। संवाद की एक विशेषता है कि संवाद में दोनों में कोई नहीं हारता, दोनों ही जीत जाते हैं ,तथा विवाद की भी एक विशेषता है कि दोनों में से कोई नहीं जीतता, दोनों ही हार जाते हैं । अंहकारी का विवादी होता है । सीता और राम के मध्य यहां विवाद नहीं, संवाद हो रहा है। सीताने कहा - भगवान ! मेरी चरण आपसे ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके श्याम हैं और मेरे गोरे हैं। दोनों में संवाद छिड़ गया । इस बीच वहां कहीं से लक्ष्मण घूमते- घामते आ गए । लक्ष्म...

चरण सुंदर : आचरण सुंदर - Charan sunder : aacharan sunder

रामायण का एक प्रसंग है - राम और सीता चित्रकूट में बैठे हैं। बैठे-बैठे राम ने कहा - सीते ! देखो मेरी चरण कितनी सुंदर है । सीता बोली - प्रभु ! लेकिन मेरे चरण तो आप से भी सुंदर है। राम बोले - नहीं, मेरे चरण ज्यादा सुंदर है। सीता बोली - नहीं ,भगवान ! मेरे चरण आप से भी ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके चरण तो श्याम है और मेरे गोरे हैं । सीता का अपना तर्क था। राम - सीता दोनों में संवाद छिड़ गया । विवाद नहीं, संवाद। विवाद तो दो अज्ञानियों के बीच होता है जबकि संवाद दो ज्ञानियों में होता है । बुद्धि से बुद्धि टकराती है विवाद होता है और हृदय से हृदय मिलता है तो संवाद होता है। संवाद की एक विशेषता है कि संवाद में दोनों में कोई नहीं हारता, दोनों ही जीत जाते हैं ,तथा विवाद की भी एक विशेषता है कि दोनों में से कोई नहीं जीतता, दोनों ही हार जाते हैं । अंहकारी का विवादी होता है । सीता और राम के मध्य यहां विवाद नहीं, संवाद हो रहा है। सीताने कहा - भगवान ! मेरी चरण आपसे ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके श्याम हैं और मेरे गोरे हैं। दोनों में संवाद छिड़ गया । इस बीच वहां कहीं से लक्ष्मण घूमते- घामते आ गए । लक्ष्मण ने प...