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आशा और अपेक्षा पर अंकुश लगाना Asha aur apeksha per Ankush lagana

गरीबी से तंग आकर एक व्यक्ति जंगल की ओर चला गया। जंगल में उसने एक संन्यासी को देखा। संन्यासी के पास जाकर वह बोला , 'महाराज मैं आपकी शरण में आया हूं। गरीब आदमी हूं , मेरा उद्धार करो। ' साधु ने कहा , ' क्या चाहिए तुम्हें। ' वह बोला , ' मेरी स्थिति देखकर पूछ रहे हैं कि क्या चाहिए मुझे। मैं गरीब हूं। धन दे दें। ' संन्यासी ने कहा , ' धन छोड़कर ही तो मैं जंगल में आया हूं। धन तो मेरे पास नहीं है। ' गरीब याचक अड़ गया। उसकी भावना देखकर संन्यासी द्रवित हो गए और बोले , ' मेरे पास तो कुछ है नहीं , दूर सामने जो नदी के पास चमकीला पत्थर है , उसे ले लो। याचक बोला , ' पत्थर तोड़-तोड़ कर ही तो मेरे हाथ में छाले पड़े हैं। कुछ धन दिलाएं जिससे गरीबी दूर हो। ' संन्यासी ने कहा , वह सामान्य पत्थर नहीं , पारस पत्थर है। वह प्रसन्न हो गया और पारस पत्थर उठाकर घर की ओर चल पड़ा। पत्थर लेकर वह चल तो पड़ा , लेकिन रास्ते में मन में उथल-पुथल होने लगी। पहले तो सोचा कि चलो अच्छा हुआ , गरीबी मिट गई , पर तत्काल दूसरा चिन्तन शुरू हो गया। चिंतन गंभीर होता गया। वह ...

एक सच्चा दोस्त ek saccha dost

विश्वयुद्ध एक में उस समय एक सैनिक के चेहरे पर दहशत छा गयी , जब उसने अपने सबसे अच्छे दोस्त को युद्ध में गिरते हुए देखा। वो अपनी सेना के द्वारा बनायीं गयी सुरक्षा स्थल पर , खुदे हुए गड्ढो में डटा हुआ था। उसने अपने अधिकारी से पूछा , की क्या वह अपने दोस्त को बचाने के लिए जा सकता है। “ अगर तुम चाहते हो , तो जा सकते हो। ” अधिकारी ने कहा , “ पर मुझे नहीं लगता तुम्हारा वहाँ जाना ठीक है। तुम्हारा दोस्त शायद अबतक मर चुका होगा। और तुम अपनी जिंदगी भी गंवा सकते हो। ” सैनिक ने उसकी बातो को अनसुना किया और किसी भी प्रकार के कवच के बगैर , किसी चमत्कारिक ढंग से जा पहुंचा। गोलियों की बरसात के बीच में से वो किसी तरह अपने दोस्त को ले तो आया। पर खुद भी थोडा घायल हो गया। जब वो अपनी सेना के पास पहुंचा तो उसके ऑफिसर ने उसके दोस्त की जाँच करते हुए कहा , “ मैंने कहा था न , इससे कुछ फ़ायदा नहीं होगा। कोई फर्क नहीं पड़ेगा। तुम्हारा दोस्त मर चुका है। ” “ मैं जानता हूँ , फिर भी इससे बहुत फर्क पड़ा है सर ”, उस सैनिक ने कहा। “ क्या मतलब तुम्हारा ? फर्क पड़ा है ? ” ऑफिसर ने कहा “ तुम्हारा दोस्त तो मर चुका है। ”...

पृथ्वी पर सर्वप्रथम श्राद्ध प्रथा इन्होंने ही शुरू की prithvi per sarvpratham shraddh pratha unhone hi shuru ki

हिन्दू धर्म में हर संतान के लिए यह परम कर्तव्य माना गया है की वह अपने पिता या पूर्वजो  को तृप्त करने के लिए श्राद्ध अवश्य करे। श्राद्ध के समय पितृलोक  से पूर्वज भोजन की आशा में पृथ्वी लोक अपने पुत्र वंशजो के पास आते है तथा श्राद्ध के रूप में हम जो प्रसाद ब्राह्मण , गाय , कौआ आदि को देते है वही प्रसाद सूक्ष्म रूप में हमारे पूर्वजो के पास पहुचता है जिसे प्राप्त कर वे अपनी भूख मिटाते है व वापस पितृलोक को प्रस्थान करते है। इसी संबंध में धर्मिक ग्रंथो  से एक कथा मिलती जिसमे  महावीर कर्ण  पहले ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने अपनेपितरो को तृप्त करने के लिए श्राद्ध का आरम्भ किया था। महावीर कर्ण कुंती के पुत्र थे तथा पांडवो में सबसे बड़े थे। अपनी  दानशीलता के कारण वे प्रसिद्ध थे  उनके द्वार पर आया जरूरतमंद और गरीब व्यक्ति कभी खाली हाथ नही गया यहा तक की भगवान श्री कृष्ण ने भी उनकी दानशीलता की अनेको बार परीक्षा ली।  महावीर कर्ण महाभारत के युद्ध में वीरगति  को प्राप्त हुए तथा उन्हें स्वर्गलोक में स्थान प्राप्त हुआ। जब वे स्वर्गलोक पहुंचे तो उनके भोजन का समय हुआ , स्वर्गलोक के  सेवक कुछ बड़े से  थाल लेक...

भगवान श्रीकृष्ण ने सुनी उसकी पुकार bhagwan Shri Krishna ne suni uski pukar

कौरवों और पाण्डवों की सेनाएँ आमने - सामने आ गईं। शंख बजने लगे , घोड़े खुरों से जमीन खूँदने और हाथी चिंघाड़ने लगे। कुरुक्षेत्र के समरांगण में सर्वनाश की तैयारी पूरी हो चुकी थी। ठीक तभी एक टिटहरी का आर्तनाद गूँज उठा।दोनों शिविरों के मध्य एक छोटी सी टेकरी थी , उसी की खोह में उसका घोंसला था। उसकी आँखें अपने बच्चों की ओर लगी थीं और कान धनुषों की टंकार पर। उसे चिंता स्व-जीवन की नहीं , अपने बच्चे की थी और निस्सहाय पुकार के रूप में आकुल मातृत्व सारे घोंसले में बिखर गया था। कृष्ण के कानों तक यह पुकार पहुँची। असंख्यों वीरों की बलि और युद्ध के भयंकर कोलाहल के बीच भी जिनकी बाँसुरी की स्वर कभी विचलित नहीं हुए थे , उन्हीं कृष्ण को इस टिटहरी के स्वर ने झकझोर डाला। वे दौड़ गए । एक पत्थर उठाकर घोंसले के द्वार पर सहेज दिया और वापस आकर अपना स्थान ग्रहण करते हुए सेनापति से कहा - महावीर भीम , अब तुम युद्ध का बिगुल बजा सकते हो। ’’

एक रात भगवान् से बात ek Raat bhagwan se baat

आज मैंने हार मानना चाही , मैंने अपनी नौकरी छोड़ दि , मेरे रिश्ते छोड़ दिए , सबकुछ छोड मैं ईश्वर से आखिरी मुलाकात करने एक जंगल में गया , “भगवान् ” मैंने कहा “ क्या आप मुझे एक ऐसी वजह दे सकते है की मैं आखिर हार में क्यों न मानू ? ” उनके जवाब ने मुझे चकित कर दिया “ आसपास देखो दोस्त ” भगवान् ने कहा‌ , “क्या तुम्हे घास और बांबू के पेड़ दिख रहे है? ” हां , मैंने कहा। ” जब मैंने इनके बीज जमीन में बोए। तो मैंने इनका बहुत ध्यान रखा। मैंने इन्हें रौशनी दी , मैंने इन्हें पानी दिया। ये छोटे - छोटे पेड़ पोधे तो बहुत जल्दी बढे हुए और पूरी धरती को हरा भरा कर दिया। पर बांबू के बीज से कुछ नहीं आया। पर मैंने बांबू को छोड़ नहीं दिया। एक साल में चारो और हरियाली ही हरियाली हो गयी। सारे पोधे फैल रहे थे। पर बांबू का नामो निशाँ तक नहीं था। चार साल हो गये फिर भी कुछ हुआ नहीं। पांचवें साल में धरती से बांबू का बीज अंकुरित हुआ। दूसरे सारे पेड़ पोधों की तुलना में ये बहुत ही छोटा था । पर केवल ६ महीने में बांबू का पेड़ सौ फिट तक बढ़ गया। उसने पांच साल अपनी जड़े मजबूत करने में उन्हें फ़ैलाने में बिताये और ...

एक दूजे के लिए ek duje ke liye

एक दंपत्ति की शादी को साठ वर्ष हो चुके थे। उनकी आपसी समझ इतनी अच्छी थी कि इन साठ वर्षों में उनमें कभी झगड़ा तक नहीं हुआ। वे एक दूजे से कभी कुछ भी छिपाते नहीं थे। हां , पत्‍‌नी के पास उसके मायके से लाया हुआ एक डिब्बा था जो उसने अपने पति के सामने कभी खोला नहीं था। उस डिब्बे में क्या है वह नहीं जानता था। कभी उसने जानने की कोशिश भी की तो पत्‍‌नी ने यह कह कर टाल दिया कि सही समय आने पर बता दूंगी। आखिर एक दिन बुढिंया बहुत बीमार हो गई और उसके बचने की आशा न रही। उसके पति को तभी ख्याल आया कि उस डिब्बे का रहस्य जाना जाये। बुढ़िया बताने को राजी हो गई। पति ने जब उस डिब्बे को खोला तो उसमें हाथ से बुने हुये दो रूमाल और 50,000 रूपये निकले। उसने पत्‍‌नी से पूछा , यह सब क्या है। पत्‍‌नी ने बताया कि जब उसकी शादी हुई थी तो उसकी दादी मां ने उससेकहा था कि ससुराल में कभी किसी से झगड़ना नहीं । यदि कभी किसी पर क्रोध आये तो अपने हाथसे एक रूमाल बुनना और इस डिब्बे में रखना। बूढ़े की आंखों में यह सोचकर खुशी के मारे आंसू आ गये और उसे अपनी पत्‍‌नी पर सचमुच गर्व हुआ। खुद को संभाल कर उसने रूपय...

विश्वास ही जीवन की पूंजी है Vishwas hi jivan ki punji hai

एक डाकू था जो साधु के भेष में रहता था। वह लूट का धन गरीबों में बाँटता था। एक दिन कुछ व्यापारियों का जुलूस उस डाकू के ठिकाने से गुज़र रहा था। सभी व्यापारियों को डाकू ने घेर लिया। डाकू की नज़रों से बचाकर एक व्यापारी रुपयों की थैली लेकर नज़दीकी तंबू में घुस गया। वहाँ उसने एक साधु को माला जपते देखा। व्यापारी ने वह थैली उस साधु को संभालने के लिए दे दी। साधु ने कहा कि तुम निश्चिन्त हो जाओ।   डाकूओं के जाने के बाद व्यापारी अपनी थैली लेने वापस तंबू में आया। उसके आश्चर्य का पार न था। वह साधु तो डाकूओं की टोली का सरदार था। लूट के रुपयों को वह दूसरे डाकूओं को बाँट रहा था। व्यापारी वहाँ से निराश होकर वापस जाने लगा मगर उस साधु ने व्यापारी को देख लिया। उसने कहा , " रूको , तुमने जो रूपयों की थैली रखी थी वह ज्यों की त्यों ही है। " अपने रुपयों को सलामत देखकर व्यापारी खुश हो गया। डाकू का आभार मानकर वह बाहर निकल गया। उसके जाने के बाद वहाँ बैठे अन्य डाकूओं ने सरदार से पूछा कि हाथ में आये धन को इस प्रकार क्यों जाने दिया। सरदार ने कहा , " व्यापारी मुझे भगवान का भक्त जानकर भरोसे के साथ थैली...