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Showing posts from February, 2019

युधिष्ठिर की राजपाट त्याग की शिक्षा । Yudhistir ki Rajpath Tyag ki ichha

महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, कौरवो का संहार हो गया था। तब भगवान श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा , "धर्मराज ! युद्ध समाप्त हो गया है ,और साथ ही साथ धर्म की विजय हुई ।अधर्मीयो का नाश हुआ है, अब आप राज्याभिषेक की तैयारी करें राज्य की लगाम अपने हाथों में ले। युधिष्ठिर ने कहा प्रभु हजारों लाखो छत्रिय युवकों का रक्त बहा है। अपने कितने स्वजन इस युद्ध में स्वाहा हो गए हैं ,अब मुझे वैराग्य आ रहा है मुझे राज सिंहासन पर नहीं बैठना है । सोच रहा हूं कि थोड़े दिन गंगा किनारे चला जाऊं और एकांत में तपस्या करू, ध्यान भजन करू, प्रायश्चित करके अपने अंदर के कर्मों का नाश करू निर्मल होकर फिर शांति से राज करो। श्री कृष्ण मुस्कुराए," पांडु पुत्र फिर आप शांति से राज नहीं कर सकेंगे क्योंकि अब कलयुग का आगमन हो रहा है, उसके लक्षणों की झलक देखनी हो तो आप पांचों भाई अलग अलग दिशा में चले जाओ, वहां पांचों को आश्चर्य दिखाई देंगे आप लोग चले जाओ वहां से लौट आने पर इस विषय में शाम को बात करेंगे पांचो पांडव पांच दिशा में निकल गए । सर्वप्रथम युधिष्ठिर में दो सूंड वाला हाथी देखा उसे देखकर धर्मराज दंग रह गए...

सत्संग की महिमा -satsang ki mahima

एक मजदूर था, और संतों का प्यारा था ,सत्संग का प्रेमी था, उसने एक प्रतिज्ञा की थी, कि जब भी किसी का सामान उठाएगा या उसकी मजुरी करेगा तब उस यजमान को वह सत्संग सुनाएगा या उस यजमान से वह सत्संग सुनगा । मजदूरी करने से पहले ही वह यह नियम सामने वाले यजमान को बता देता था और उसकी मंजूरी होने पर ही काम करता था। एक बार एक सेठ आया उसने सामान उठाने को कहा, मजदूर जल्दबाजी में अपना नियम भूल गया ,और सामान उठाकर सेठ के साथ चलने लगा, आधे रास्ते जाने के बाद मजदूर को अपना नियम याद आया तो उसने बीच रास्ते में ही सामान उतार कर रख दिया और सेठ से कहा - सेठ जी मेरा नियम है, कि आप मुझे सत्संग सुनाएं या मैं आपको सुनाउ तभी मैं सामान उठाउंगा । सेठ को जरा जल्दी थी इसीलिए सेठ ने कहा भाई तू ही सुना मैं सुनता हूं । मजदूर के अंदर छुपा संत जाग गया और सत्संग के प्रवचन धारा बहना शुरू हो गई। सफर सत्संग सुनते सुनते कट गया । सेठ के घर पहुंचते ही सेठ ने मजदूर का पैसा अदा कर दिया । मजदूर ने पूछा - क्यों सेठ जी ,सत्संग याद रहा । मैंने तो कुछ नहीं सुना, मुझे जल्दी थी, और आधे रास्ते आने के बाद में दूसरा मजदूर कहां खोजने जाऊं , इसल...

गुरु ही तारणहार है - guru hi taranhara hai

एक बार नारद जी भगवान लक्ष्मी नारायण के दर्शन हेतु पहुंचे। भगवान ने नारद जी से कुशलता पूछी और उन्हें आशीर्वाद प्रदान किया। नारद जी ने बताया कि वह पृथ्वी लोक पर भ्रमण करके आ रहे है। लक्ष्मी माता ने कहा नारद जी ,आपने पृथ्वी लोक पर गुरु से दीक्षा ली या नहीं। नारद जी ने कहा नहीं माता इस पर लक्ष्मीजी माता ने कहा कि पृथ्वी लोक ही ऐसी जगह है जहां पर मनुष्य नर से नारायण बन सकता है । बिना गुरु के यह असंभव है। और आप पृथ्वी लोक पर जाकर भी बिना गुरु बनाएं ही आ गए। लक्ष्मी माता जी ने कहा आप दोबारा पृथ्वी लोक पर जाएं और गुरु से दीक्षा लेकर आएं अन्यथा आपका यहां आना वर्जित कर दिया जाएगा । नारद जी भगवान और माता को प्रणाम करके पुनः पृथ्वी लोक पर जाने के लिए प्रस्थान कर गए। नारद जी पृथ्वी लोक पहुंचकर विचार करने लगे की माता ने कहा है इसीलिए गुरु तो बनाना ही है। तो उन्होंने विचार किया कि जो सुबह में समुद्र के तट पर सबसे प्रथम व्यक्ति मुझे दिखाई देगा उसे ही मैं अपना गुरु बना लूंगा । सुबह सुबह नारद जी सागर तट पर इंतजार कर रहे थे, कि उन्हें सामने से एक मछुआरा आता हुआ दिखाई दिया। उन्होंने तुरंत ही मछुआरे के पै...

निष्काम गुरु सेवा Nishkaam Guru Seva

वैदिक काल में सुभाष नाम का एक विद्यार्थी गुरुदेव के चरणों में विद्या अध्ययन करने गया। विद्या के साथ में पूरी तन्मयता के साथ में गुरु भक्ति में लग गया। ऐसी गुरु भक्ति की ऐसी गुरु सेवा की, कि गुरू के हृदय में बस गया। गुरु का हृदय जीत लिया। विद्या उपार्जन के बाद जब अपने घर जाने के लिए निकला गुरु जी ने कहा,"बेटा आपने मेरा दिल जीत लिया है, पर हम तो साधारण साधु हैं।हमारे पास धन-दौलत राज्य सत्ता कुछ नहीं है अब तुझे क्या दूं बेटा जिससे तेरा कल्याण हो जाए ऐसा कहते हुए उन्होंने अपनी छाती का एक बाल उखाड़ कर उसे देते हुए कहा - बेटा ले इसे प्रसाद समझकर संभाल के रख ले। जब तक यह तेरे पास रहेगा धन - वैभव - संपत्ति -लक्ष्मी की कोई कमी नहीं रहेगी। गुरुदेव," आपने मुझे पहले ही सब कुछ दे दिया है।" वह तो है ! फिर भी मेरी खुशी के लिए रख ले। सुभाष ने खूब आदर पूर्वक बाल को रख लिया।उसकी सेवा पूजा करता था। घर में सुख शांति समृद्धि का वास हो गया वह धनवान हो गया उसकी ख्याति चारों तरफ फैल ने लग गई। सुभाष के पड़ोसी ने देखा और सोचा यह भी विद्या ग्रहण करके आया है , और मैं भी विद्या ग्रहण करके आया हूं, औ...

जीतने में जो आनंद नहीं - वह जिताने में है । - Jeetne main woh anand nahi jo jitaane main hai

खरगोश कछुए के पास आया और उससे एक बार फिर दौड़ने की प्रतियोगिता करने को कहा । उसने कहा कि उसके एक पूर्वज ने पहले दौड में हारकर उनकी बिरादरी का नाम नीचा कर दिया था । वह उस दौड को जीतकर नई पीढ़ी का नाम रौशन करना चाहता था । कछुआ तैयार हो गया । निश्चित दिन और समय पर जंगल के राजा शेर ने दौड़ शुरू करवाई । खरगोश ने दौड़कर लगभग पूरा रास्ता मिनटों में पार कर लिया । वह अंतिम रेखा से केवल सौ कदम दूर था । वह सांस लेने के लिए रुका । उसने सोचा कि वह कछुए को देखते ही दौड़ पूरी कर लेगा । लेकिन रुकने पर उसकी नींद लग गई । कोई पन्द्रह मिनट के बाद ,कछुआ वहां पहुंचा। खरगोश के पास पहुंचकर कछुआ कुछ देर रुका और सोचा... फिर उसने खरगोश को नींद से जगाया और बोलो," तुम क्या कर रहे हो ? क्या तुम्हें तुम्हारे पूर्वज द्वारा तुम्हारी बिरादरी का नाम नीचा कर देना याद नही ? क्या तुम्हें नही पता कि तुम्हारे यहां सोने से हमारी नई पीढ़ी को कितनी समय शर्मिन्दगी उठानी पड़ेगी ? उठो, और बाकी दौड़ पूरी करो । मैं भी आता हूं।" खरगोश अचरज में पड़ गया । उसने कहा," फिर कुछ, जब तुम खुद दौड़ जीत सकते थे, तो तुमने मुझे क्य...

चरण सुंदर : आचरण सुंदर – Charan sunder : aacharan sunder

रामायण का एक प्रसंग है - राम और सीता चित्रकूट में बैठे हैं। बैठे-बैठे राम ने कहा - सीते ! देखो मेरी चरण कितनी सुंदर है । सीता बोली - प्रभु ! लेकिन मेरे चरण तो आप से भी सुंदर है। राम बोले - नहीं, मेरे चरण ज्यादा सुंदर है। सीता बोली - नहीं ,भगवान ! मेरे चरण आप से भी ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके चरण तो श्याम है और मेरे गोरे हैं । सीता का अपना तर्क था। राम - सीता दोनों में संवाद छिड़ गया । विवाद नहीं, संवाद। विवाद तो दो अज्ञानियों के बीच होता है जबकि संवाद दो ज्ञानियों में होता है । बुद्धि से बुद्धि टकराती है विवाद होता है और हृदय से हृदय मिलता है तो संवाद होता है। संवाद की एक विशेषता है कि संवाद में दोनों में कोई नहीं हारता, दोनों ही जीत जाते हैं ,तथा विवाद की भी एक विशेषता है कि दोनों में से कोई नहीं जीतता, दोनों ही हार जाते हैं । अंहकारी का विवादी होता है । सीता और राम के मध्य यहां विवाद नहीं, संवाद हो रहा है। सीताने कहा - भगवान ! मेरी चरण आपसे ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके श्याम हैं और मेरे गोरे हैं। दोनों में संवाद छिड़ गया । इस बीच वहां कहीं से लक्ष्मण घूमते- घामते आ गए । लक्ष्म...

चरण सुंदर : आचरण सुंदर - Charan sunder : aacharan sunder

रामायण का एक प्रसंग है - राम और सीता चित्रकूट में बैठे हैं। बैठे-बैठे राम ने कहा - सीते ! देखो मेरी चरण कितनी सुंदर है । सीता बोली - प्रभु ! लेकिन मेरे चरण तो आप से भी सुंदर है। राम बोले - नहीं, मेरे चरण ज्यादा सुंदर है। सीता बोली - नहीं ,भगवान ! मेरे चरण आप से भी ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके चरण तो श्याम है और मेरे गोरे हैं । सीता का अपना तर्क था। राम - सीता दोनों में संवाद छिड़ गया । विवाद नहीं, संवाद। विवाद तो दो अज्ञानियों के बीच होता है जबकि संवाद दो ज्ञानियों में होता है । बुद्धि से बुद्धि टकराती है विवाद होता है और हृदय से हृदय मिलता है तो संवाद होता है। संवाद की एक विशेषता है कि संवाद में दोनों में कोई नहीं हारता, दोनों ही जीत जाते हैं ,तथा विवाद की भी एक विशेषता है कि दोनों में से कोई नहीं जीतता, दोनों ही हार जाते हैं । अंहकारी का विवादी होता है । सीता और राम के मध्य यहां विवाद नहीं, संवाद हो रहा है। सीताने कहा - भगवान ! मेरी चरण आपसे ज्यादा सुंदर है क्योंकि आपके श्याम हैं और मेरे गोरे हैं। दोनों में संवाद छिड़ गया । इस बीच वहां कहीं से लक्ष्मण घूमते- घामते आ गए । लक्ष्मण ने प...

संत हरिद्वार : सत्संग गंगा स्नान - Sant Haridwar : satsang Ganga snan

एक महिला ने प्रवचन - कथा में सुना की सत्संग से वैकुंठ मिलता है, क्योंकि संत हरिद्वार है और सत्संग गंगा स्नान है। दूसरे दिन जाकर उसने पति से कहा - देखो, एक बहुत बड़े संत आए हैं और उनका सत्संग चल रहा है। सारा गांव सत्संग का लाभ ले रहा है। बड़ा आनंद बरस रहा है, तुम भी सत्संग का लाभ लो क्योंकि सत्संग का फल वैकुंठ है। पत्नी के विशेष आग्रह पर वह दूसरे दिन सत्संग में गया। वहां जाकर सत्संग में बैठा और 10:15 मिनट बाद बार बार इधर-उधर देखने लगा कि वैकुंठ ले जाने वाला कोई विमान आया या नहीं। घंटा भर वह बैठा रहा वहां। विमान कहां से आना था ?जब उसे लगा कि अब कोई विमान आने वाला नहीं है, कोई वैकुंठ मिलने वाला नहीं है तो गुस्से से उठा और संत को भला - बुरा कहते कहते - सत्संग से बाहर निकल गया। घर जा रहा था। गुस्से में तो था ही। रास्ते में नारद जी मिल गए। नारद ने पूछा -भाई! क्या बात है? किसे गाली दे रहे हो? बोला -यह संत लोग बड़े धोखेबाज होते हैं । जनता को गुमराह करते हैं कि सत्संग से वैकुंठ मिलता है। अरे! मैं वहां घंटा पर बैठा ,पर वहां वैकुंठ तो क्या एक कप चाय भी नहीं मिली। उस आदमी ने नारद से पूछा कि आप ही ...

अहंकार दीवार है और समर्पण द्वार है।-ahankaar deewar hai aur samarpan dwar hai.

एक छोटी - सी घटना है। एक चोर प्रतिदिन चोरी करता था ।एक दिन पूरी रात इधर उधर घूमता रहा था,कहीं चोरी का दाव न लगा। सुबह हो चली थी। उदास और निराश वापस घर लौट रहा था। रास्ते में शिवजी का मंदिर पड़ा। सोचा आज तो मुहूर्त ही ठीक नहीं था। चलो शिव जी को प्रणाम कर लूं, हो सकता है कल का मुहूर्त ठीक हो जाए । मंदिर में गया। शिव जी को प्रणाम किया। मंदिर में इधर-उधर दृष्टि दौड़ाई तो वहां कुछ नहीं था । ऊपर देखा तो शिव जी की मूर्ति पर एक घंटा लटक रहा था। फिर क्या था? चोर ने सोचा - आज तो कुछ मिला नहीं, घर खाली कैसे जाऊं ? और फिर भगवान के दरवाजे से तो कोई खाली नहीं जाता। चलो घंटा ही चुरा लेता हूं ।कुछ तो काम चलेगा। घंटा बहुत ऊंचा था। उसका हाथ उस पर पहुंच नहीं पा रहा था ।अब क्या करें ? हड़बड़ी में उसे कुछ सूझा नहीं तो घंटा चुराने के लिए मूर्ति पर ही चढ गया। ज्योंही वह मूर्ति पर चढ़ा , शिव जी प्रकट हो गए। बोले- वत्स !मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूं ।घंटा वंटा छोड़ ,आज मुझसे मांग ले तुझे क्या चाहिए? चोर तो घबरा गया ।उसने सोचा - बुरे फंसे। वह क्षमा - याचना करने लगा । शिवजी बोले- घबरा मत ! मैं पुलिस वाला नहीं ...

आत्मा सो परमात्मा-Aatma se parmatma

एक बार एक शिष्य ने गुरु से पूछा गुरुदेव परमात्मा हमें दिखाई क्यों नहीं देता है? गुरु गुरु ने शिष्य से कहा मैं तुझे एक कहानी सुनाता हूं पर इसे तू कहानी समझ कर ही सुनना इसका यथार्थ से कोई लेना देना नहीं है। बात तब की है जब परमात्मा जगत की सृष्टि कर रहे थे। त्रिदेव की आज्ञा पर भगवान ने सभी जीव जंतु की रचना की और अंत में उसने अपने सर्वश्रेष्ठ रचना मनुष्य को रचा। जब मनुष्य पूर्ण रूप से तैयार हो गया तो भगवान ने उसे भी पृथ्वी पर दूसरे जीव जंतुओं के समान भेज दिया। भगवान आश्वस्त होकर आराम करने चले गए। कुछ ही देर बाद मानव फिर से भगवान के सन्मुख खड़ा था। भगवान ने पूछा क्या है मानव आप वापस क्यों लौट आए। मानव ने कहा प्रभु आपने इस जगत में बुद्धि और सोचने समझने की शक्ति सिर्फ मुझे दी है। यह आपका परम उपकार है मानव जाति पर मगर भगवान मैंने सोचा कि मैं दूसरे जीव जंतु के समान निर्वस्त्र तो इस जगत में नहीं ना विचरण कर सकता हूं। तो आप से विनंती है कि आप मुझे वस्त्र प्रदान करें। भगवान ने तुरंत ही मानव को वस्त्र का दान कर दिया और मानव वस्त्र लेकर पृथ्वी पर आ गया। भगवान फिर आराम करने चले तो देखा कि मानव फिर...

दिखता नहीं पर देखता है वह हां - Dikhta nahin par dekhata hai vah haan

एक गुरुकुल में गुरु अपने शिष्य को शिक्षा प्रदान करते थे। एक बार जब गुरु की निवृत्ति का समय आया तो गुरु ने अपने पद के लिए चार शिष्यों का चयन किया। चारों ही शिष्य एक से बढ़कर एक विद्वान थे। गुरु में उन चारों की परीक्षा लेने का विचार किया। गुरु ने शिष्य से कहा कि जो भी इस परीक्षा में उत्तीर्ण होगा वह गुरुकुल का नया गुरु घोषित किया जाएगा। दूसरे दिन प्रातः गुरु ने चारों शिष्यों को बुलाया और उन्हें चार चार रोटियां दे दी और कहा कि आप लोगों को शाम तक में यह चारों रोटियां खा लेनी है पर याद रखें की रोटियां खाते समय आपको किसी ने देखना नहीं चाहिए यह आपकी परीक्षा है। चारों शिष्य गुरु को नमन कर अपनी अपनी रोटियां लेकर जंगल की तरफ चल दिए शाम के समय चारों शिष्य गुरु के पास पहुंचे गुरु ने चारों से रोटियां कहां और कब कैसे खाई यह पूछा । पहला शिष्य – गुरु जी मैं जंगल में गया वहां मैं एकांत में जाकर मैंने रोटियां खा ली । दूसरा शिष्य – मैंने एक कुएं में जाकर रोटियां खा ली । तीसरा शिष्य – मैंने एक गुफा में जाकर रोटियां खा ली । चौथा शिष्य – गुरु जी को नमन किया और बड़े भोलेपन से उसने चारों...

दिखता नहीं पर देखता है वह हां

एक गुरुकुल में गुरु अपने शिष्य को शिक्षा प्रदान करते थे। एक बार जब गुरु की निवृत्ति का समय आया तो गुरु ने अपने पद के लिए चार शिष्यों का चयन किया। चारों ही शिष्य एक से बढ़कर एक विद्वान थे। गुरु में उन चारों की परीक्षा लेने का विचार किया। गुरु ने शिष्य से कहा कि जो भी इस परीक्षा में उत्तीर्ण होगा वह गुरुकुल का नया गुरु घोषित किया जाएगा। दूसरे दिन प्रातः गुरु ने चारों शिष्यों को बुलाया और उन्हें चार चार रोटियां दे दी और कहा कि आप लोगों को शाम तक में यह चारों रोटियां खा लेनी है पर याद रखें की रोटियां खाते समय आपको किसी ने देखना नहीं चाहिए यह आपकी परीक्षा है। चारों शिष्य गुरु को नमन कर अपनी अपनी रोटियां लेकर जंगल की तरफ चल दिए शाम के समय चारों शिष्य गुरु के पास पहुंचे गुरु ने चारों से रोटियां कहां और कब कैसे खाई यह पूछा । पहला शिष्य - गुरु जी मैं जंगल में गया वहां मैं एकांत में जाकर मैंने रोटियां खा ली । दूसरा शिष्य - मैंने एक कुएं में जाकर रोटियां खा ली । तीसरा शिष्य - मैंने एक गुफा में जाकर रोटियां खा ली । चौथा शिष्य - गुरु जी को नमन किया और बड़े भोलेपन से उसने चारों रोटियां गुरु जी के ...

अन्नदान से अभयदान तक

बहुत पुरानी यह बात है एक गांव में एक पंडित रहता था। हालांकि चालीसगांव का वह एकमात्र पंडित था। एक समय की बात है कि पंडित एक गांव में पहुंचा वह वहां किसी का विवाह कराने पहुंचा था। सवेरे के वक्त सभी बड़े बूढ़े गांव की चौपाल पर बैठकर धूप सेक रहे थे ।गांव वालों ने पंडित को देख कर उस का अभिवादन किया उससे राम-राम कहा और उसके आने का कारण जाना। पंडित ने सभी से राम राम कहा और वहीं बैठ कर लोगों को उनका भविष्य बताने लगा। पंडित ज्योतिष विद्या का प्रकांड पंडित था। इसलिए सभी लोग जिज्ञासा वश उससे कुछ ना कुछ जानने के लिए उसके पास उसे घेरकर खड़े हो गए। पंडित भी लोगों की जिज्ञासा का निराकरण करना चालू कर दिया तथा उनकी समस्याओं का हल बताने में व्यस्त हो गया । तभी उसकी नजर दो नौजवान युवकों पर पड़ी जो अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर जंगल में लकड़ियां काटने के लिए जा रहे थे। उन दोनों युवकों को देखकर अनायास ही पंडित जी के मुंह से निकल गया कि कितने मासूम और कोमल हैं । इस पर गांव वालों ने उनके ऐसा कहने का कारण पूछा तो पंडित जी ने कहा कि यह दोनों नौजवान आज शाम का ढलता हुआ सूरज नहीं देख पाएंगे अर्थात दोनों का आज अंत...

अन्नदान से अभयदान तक- Annadaan se abhayadaan tak

बहुत पुरानी यह बात है एक गांव में एक पंडित रहता था। हालांकि चालीसगांव का वह एकमात्र पंडित था। एक समय की बात है कि पंडित एक गांव में पहुंचा वह वहां किसी का विवाह कराने पहुंचा था। सवेरे के वक्त सभी बड़े बूढ़े गांव की चौपाल पर बैठकर धूप सेक रहे थे ।गांव वालों ने पंडित को देख कर उस का अभिवादन किया उससे राम-राम कहा और उसके आने का कारण जाना। पंडित ने सभी से राम राम कहा और वहीं बैठ कर लोगों को उनका भविष्य बताने लगा। पंडित ज्योतिष विद्या का प्रकांड पंडित था। इसलिए सभी लोग जिज्ञासा वश उससे कुछ ना कुछ जानने के लिए उसके पास उसे घेरकर खड़े हो गए। पंडित भी लोगों की जिज्ञासा का निराकरण करना चालू कर दिया तथा उनकी समस्याओं का हल बताने में व्यस्त हो गया । तभी उसकी नजर दो नौजवान युवकों पर पड़ी जो अपने कंधे पर कुल्हाड़ी रखकर जंगल में लकड़ियां काटने के लिए जा रहे थे। उन दोनों युवकों को देखकर अनायास ही पंडित जी के मुंह से निकल गया कि कितने मासूम और कोमल हैं । इस पर गांव वालों ने उनके ऐसा कहने का कारण पूछा तो पंडित जी ने कहा कि यह दोनों नौजवान आज शाम का ढलता हुआ सूरज नहीं देख पाएंगे अर्थात दोनों...

अपने ही अपनों के दुश्मन होते हैं

बहुत ही पुरानी बात है । जब मैं बहुत छोटा हुआ करता था मेरी बहनें मुझे सभी बड़ी है। मैं छोटा था घर में मेरी बहनों की शादी हो गई थोड़े ही दिनों में उनके घर एक छोटा मेहमान भी आ गया। सभी घरवाले अड़ोस पड़ोस के लोग उस नन्हे मेहमान को प्यार करने लगे । मेरी बहन जब भी बाजार जाती या घर का कुछ काम करती तो उस छोटे मेहमान को संभालने की जिम्मेदारी मेरी होती थी । मैं बड़े प्यार से उस बालक के साथ खेलता उसे संभालता उसकी देखरेख करता था। एक दिन कुछ मेरे दोस्त भी खेलने चले आए और मैं खेलने में इतना मशगूल हो गया कि मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि उस छोटे बालक की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई है । मैं दोस्तों के साथ खेल खेलने में मस्त था । बालक की तरफ जरा सा भी ध्यान नहीं था । क्योंकि मैं भी छोटा था और बालक आराम से पलंग पर सो रहा था अचानक पता नहीं हम बच्चों की शोर की वजह से वह छोटा बालक उठ गया और पलंग से सरकते हुए जमीन पर गिर पड़ा । भगवान का शुक्र है कि बालक को कोई गंभीर चोट नहीं आई पर जब मेरी बहन को इस बात का पता चला तो हमारे पूरे घर के सदस्यों ने मुझे बहुत फटकार लगाई और गुस्से से दो-तीन तमाचे भी जड़ दिए । आज...

अपने ही अपनों के दुश्मन होते हैं - Apane hee apanon ke dushman hote hain

बहुत ही पुरानी बात है । जब मैं बहुत छोटा हुआ करता था मेरी बहनें मुझे सभी बड़ी है। मैं छोटा था घर में मेरी बहनों की शादी हो गई थोड़े ही दिनों में उनके घर एक छोटा मेहमान भी आ गया। सभी घरवाले अड़ोस पड़ोस के लोग उस नन्हे मेहमान को प्यार करने लगे । मेरी बहन जब भी बाजार जाती या घर का कुछ काम करती तो उस छोटे मेहमान को संभालने की जिम्मेदारी मेरी होती थी । मैं बड़े प्यार से उस बालक के साथ खेलता उसे संभालता उसकी देखरेख करता था। एक दिन कुछ मेरे दोस्त भी खेलने चले आए और मैं खेलने में इतना मशगूल हो गया कि मुझे इस बात का ध्यान ही नहीं रहा कि उस छोटे बालक की जिम्मेदारी मुझे सौंपी गई है । मैं दोस्तों के साथ खेल खेलने में मस्त था । बालक की तरफ जरा सा भी ध्यान नहीं था । क्योंकि मैं भी छोटा था और बालक आराम से पलंग पर सो रहा था अचानक पता नहीं हम बच्चों की शोर की वजह से वह छोटा बालक उठ गया और पलंग से सरकते हुए जमीन पर गिर पड़ा । भगवान का शुक्र है कि बालक को कोई गंभीर चोट नहीं आई पर जब मेरी बहन को इस बात का पता चला तो हमारे पूरे घर के सदस्यों ने मुझे बहुत फटकार लगाई और गुस्से से दो-तीन तमाचे...

निंदा

पत्नी ने पति से कहाँ- टीवी कि आवाज जरा कम कर दो इस आवाज की वजह से पडोस मैं जो पति- पत्नी झगड रहे है वह मुझे सुनाई नहीं दे रहा है। सबक दुसरो कि निंदा सुनने में बडा आंनद आता है इस लिए गुरु के हितकारी प्रवचन हम सुन नहीं सकते हैं। निंदा करना और सुनना प्रवचन सुनने के लिए बाधक भी है और उसके प्रभाव को नाश करने वाला है।

पाप धन या नुकसान होने का मूल कारण क्या है

एक गांव में पंडित ब्राह्मण रहता था उसकी एक बेटी थी। ब्राह्मण का एक शिष्य था। जो उससे पंडिताई सीख रहा था। शिष्य की शिक्षा समाप्त होने पर उस शिष्य ने पंडित से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया पंडित के मन में विचार आया कि इस शिष्य को क्यों ना अपना दामाद बना लिया जाए । इस विचार के आते ही उसने शिष्य से गुरु दक्षिणा स्वरूप उसका दामाद बनने का आग्रह किया शिष्य ने गुरु दक्षिणा स्वरूप पंडित की बेटी से विवाह करना मंजूर कर लिया। इसके उपरांत विवाह पूर्ण हुआ शिष्य अपनी पत्नी को लेकर नदी के उस पार अपने गांव चला आया रात्रि की मंगलमय बेला में पंडित की बेटी ने अपने पति से कहा आप ज्ञानी पुरुष हो और मेरे पति हो मैं एक ज्ञानी पंडित की बेटी हूं इसीलिए आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं उस सवाल का जवाब देकर आप मुझे से जो भी चाहेंगे वह मैं करने के लिए तैयार हो जाऊंगी ऐसी मेरी आपसे गुजारिश है। शिष्य ने तुरंत ही पत्नी को वचन दे दिया। पत्नी ने सवाल पूछा कि बताओ पाप का बाप कौन है। शिष्य ने रात भर सभी पोथी पुरान खोल कर पढ़ कर देख लिए पर उसे कहीं भी पाप के बाप का नाम नहीं मिला। प्रातः का पहला प्रहर था उसके मन मे...

कर्म से धर्म की एक राह पर - Karm se dharm kee ek raah par

समय सबका हमेशा अच्छा होता है, पर कर्म के हिसाब से ही समय चलता है। समय की अनुकूलता आपके धर्म के आचरण पर निर्भर करती है । धर्म का साथ हो तो कर्म भी अच्छे और पाप रहित होते हैं । जो धर्म संगत होता है समय और हालात उसके हिसाब से चलते हैं । लोग समय को अच्छा या बुरा बताते हैं ,पर समय अच्छा होता है और ना ही बुरा होता है। मनुष्य के कर्म ही अच्छे या बुरे होते हैं ,उसके फल स्वरुप ही देह को भोग मिलता है । सबसे पहले धर्म का आचरण जरूरी है ,क्योंकि बिना धर्म के मानव का कोई अस्तित्व नहीं है । आजकल लोग धर्म से ज्यादा जाति पर विश्वास करते हैं । धर्म सर्वोपरि है ,धर्म आदि और अंत है, धर्म ही अंत में काम और साथ आता है। माया तो शरीर के साथ ही समाप्त हो जाती है ,फिर भी संसार में माया के बिना जीना संभव नहीं है ,पर सिर्फ जरूरत के समान ही अगर हम माया का संग्रह करें तो हमें ज्यादा कष्ट नहीं होगा, ज्यादातर जिसके पास जितनी ज्यादा माया उसका उतना ज्यादा मौह इस देह से होता है ।अंत में जब देह को त्याग ने का समय आने पर मोह और माया होने के कारण आत्मा को देह का त्याग करने में काफी कठिनाई होती है। इसलिए ...

कर्म से धर्म की एक राह पर - Karm se dharm kee ek raah par

समय सबका हमेशा अच्छा होता है, पर कर्म के हिसाब से ही समय चलता है। समय की अनुकूलता आपके धर्म के आचरण पर निर्भर करती है । धर्म का साथ हो तो कर्म भी अच्छे और पाप रहित होते हैं । जो धर्म संगत होता है समय और हालात उसके हिसाब से चलते हैं । लोग समय को अच्छा या बुरा बताते हैं ,पर समय अच्छा होता है और ना ही बुरा होता है। मनुष्य के कर्म ही अच्छे या बुरे होते हैं ,उसके फल स्वरुप ही देह को भोग मिलता है । सबसे पहले धर्म का आचरण जरूरी है ,क्योंकि बिना धर्म के मानव का कोई अस्तित्व नहीं है । आजकल लोग धर्म से ज्यादा जाति पर विश्वास करते हैं । धर्म सर्वोपरि है ,धर्म आदि और अंत है, धर्म ही अंत में काम और साथ आता है। माया तो शरीर के साथ ही समाप्त हो जाती है ,फिर भी संसार में माया के बिना जीना संभव नहीं है ,पर सिर्फ जरूरत के समान ही अगर हम माया का संग्रह करें तो हमें ज्यादा कष्ट नहीं होगा, ज्यादातर जिसके पास जितनी ज्यादा माया उसका उतना ज्यादा मौह इस देह से होता है ।अंत में जब देह को त्याग ने का समय आने पर मोह और माया होने के कारण आत्मा को देह का त्याग करने में काफी कठिनाई होती है। इ...

पाप धन या नुकसान होने का मूल कारण क्या है - Paap dhan ya nukasaan hone ka mool kaaran kya hai

एक गांव में पंडित ब्राह्मण रहता था उसकी एक बेटी थी। ब्राह्मण का एक शिष्य था। जो उससे पंडिताई सीख रहा था। शिष्य की शिक्षा समाप्त होने पर उस शिष्य ने पंडित से गुरु दक्षिणा मांगने का आग्रह किया पंडित के मन में विचार आया कि इस शिष्य को क्यों ना अपना दामाद बना लिया जाए । इस विचार के आते ही उसने शिष्य से गुरु दक्षिणा स्वरूप उसका दामाद बनने का आग्रह किया शिष्य ने गुरु दक्षिणा स्वरूप पंडित की बेटी से विवाह करना मंजूर कर लिया।   इसके उपरांत विवाह पूर्ण हुआ शिष्य अपनी पत्नी को लेकर नदी के उस पार अपने गांव चला आया रात्रि की मंगलमय बेला में पंडित की बेटी ने अपने पति से कहा आप ज्ञानी पुरुष हो और मेरे पति हो मैं एक ज्ञानी पंडित की बेटी हूं इसीलिए आपसे एक सवाल पूछना चाहती हूं उस सवाल का जवाब देकर आप मुझे से जो भी चाहेंगे वह मैं करने के लिए तैयार हो जाऊंगी ऐसी मेरी आपसे गुजारिश है।   शिष्य ने तुरंत ही पत्नी को वचन दे दिया। पत्नी ने सवाल पूछा कि बताओ पाप का बाप कौन है।   शिष्य ने रात भर सभी पोथी पुरान खोल कर पढ़ कर देख लिए पर उसे कहीं भी पाप के बाप का नाम नहीं मिला। ...